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L&T में 6.5 दिन और 14 घंटे काम: Ex-Employee ने सुनाई Construction Site की जिंदगी, 4 घंटे Permission लेते थे

भारत में लंबे working hours और work-life balance को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार चर्चा Larsen & Toubro यानी L&T के कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में काम करने के पुराने अनुभव को लेकर शुरू हुई है। चेन्नई के उद्यमी सुंदरा राजन ने सोशल मीडिया पर अपने पुराने नौकरी के दिनों को याद करते हुए बताया कि जब वह L&T Construction के प्रोजेक्ट साइट्स पर काम करते थे, तब सप्ताह में करीब 6.5 दिन और रोजाना 10 से 14 घंटे तक काम करना सामान्य बात थी। उन्होंने यह अनुभव 1986 से 1994 के बीच का बताया है।

राजन ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि L&T Construction के प्रोजेक्ट साइट्स पर काम का शेड्यूल काफी लंबा होता था और प्रोजेक्ट मैनेजर भी टीम के साथ आगे रहकर काम करता था। उनकी पोस्ट के बाद लोगों के बीच यह सवाल फिर चर्चा में आ गया कि भारत में construction और infrastructure जैसे sectors में लंबे working hours को किस तरह देखा जाना चाहिए।

इस चर्चा को इसलिए भी ज्यादा ध्यान मिला क्योंकि पिछले वर्ष L&T के चेयरमैन एस.एन. सुब्रह्मण्यन की 90 घंटे के workweek और रविवार को भी काम करने संबंधी टिप्पणियों ने देशभर में work-life balance को लेकर बहस छेड़ दी थी। अब एक पूर्व कर्मचारी के पुराने अनुभव ने उसी चर्चा को फिर सामने ला दिया है।

6.5 दिन काम और रोज 10 से 14 घंटे की ड्यूटी

सुंदरा राजन के अनुसार, उन्होंने L&T Construction में प्रोजेक्ट साइट्स पर काम करते समय सप्ताह में करीब साढ़े छह दिन काम किया। उनका कहना है कि रोजाना काम के घंटे लगभग 10 से 14 घंटे तक पहुंच जाते थे। यह उनका व्यक्तिगत अनुभव है और उन्होंने इसे 1986 से 1994 के बीच की अपनी नौकरी से जोड़कर बताया है।

कंस्ट्रक्शन साइट पर काम सामान्य ऑफिस की तरह नहीं होता। किसी प्रोजेक्ट पर इंजीनियर, साइट मैनेजर, सुपरवाइजर और अन्य कर्मचारियों को निर्माण की प्रगति के साथ लगातार तालमेल रखना पड़ता है। मशीनरी, मजदूर, सामग्री, ठेकेदार और अलग-अलग टीमों के काम एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। किसी एक हिस्से में देरी होने पर पूरे प्रोजेक्ट के टाइमलाइन पर असर पड़ सकता है।

राजन की पोस्ट के मुताबिक उस समय प्रोजेक्ट साइट पर लंबे घंटे काम करना उनके लिए काम की सामान्य दिनचर्या का हिस्सा था। उन्होंने यह भी बताया कि प्रोजेक्ट मैनेजर खुद टीम का नेतृत्व करता था और साइट पर काम की जिम्मेदारी काफी सीधे तरीके से संभाली जाती थी।

हालांकि उनके अनुभव को आज की हर L&T साइट या हर कर्मचारी की वर्तमान working condition के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। राजन ने जिस अवधि की बात की है, वह करीब तीन दशक पुरानी है। इसलिए यह अनुभव मुख्य रूप से उस दौर के project-site work culture की उनकी व्यक्तिगत याद के तौर पर देखा जाना चाहिए।

निजी काम के लिए चार घंटे की परमिशन क्यों लेनी पड़ती थी?

राजन के बयान का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर विशेष रूप से चर्चा में आया। उन्होंने बताया कि सप्ताह के दिनों में निजी काम निपटाने के लिए वह कभी-कभी चार घंटे की permission लिया करते थे।

उन्होंने जिन कामों का जिक्र किया, उनमें बैंकिंग से जुड़े काम, डाक भेजना, घर फोन करना और बाल कटवाना जैसे सामान्य निजी काम शामिल थे। उनका कहना था कि लंबे कामकाजी घंटों के कारण ऐसे निजी कामों के लिए सप्ताह के दौरान अलग से समय निकालना पड़ता था।

आज के समय में यह बात कई लोगों को असामान्य लग सकती है, लेकिन प्रोजेक्ट साइट की जिंदगी में कर्मचारियों की दिनचर्या अक्सर सामान्य शहर के ऑफिस शेड्यूल से अलग होती है। कई construction projects शहरों से दूर या अलग-अलग राज्यों में चलते हैं। कर्मचारियों को प्रोजेक्ट की जरूरत के अनुसार साइट पर रहना पड़ सकता है।

ऐसी स्थिति में बैंक का काम, व्यक्तिगत दस्तावेजों का काम या परिवार से संपर्क जैसी चीजों के लिए भी अलग समय निकालना पड़ सकता है। राजन के अनुसार, उनके समय में चार घंटे की permission लेकर इन कामों को पूरा करना एक व्यावहारिक तरीका था।

पुराने अनुभव ने फिर क्यों शुरू कर दी work-life balance की बहस?

राजन की पोस्ट ऐसे समय में सामने आई है जब भारत में लंबे working hours को लेकर बहस पहले से चल रही है। 2025 में L&T के चेयरमैन एस.एन. सुब्रह्मण्यन की 90 घंटे काम करने और रविवार को भी कर्मचारियों से काम कराने की टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की थी।

उस समय सुब्रह्मण्यन ने एक internal interaction के दौरान कहा था कि उन्हें अफसोस है कि वह कर्मचारियों को रविवार को काम करने के लिए नहीं कह पा रहे हैं। उन्होंने लंबे working hours को वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जोड़ते हुए अपने विचार रखे थे। इन टिप्पणियों को लेकर कुछ लोगों ने work-life balance और employee well-being पर सवाल उठाए थे।

अब राजन के पुराने अनुभव ने इस बहस को एक अलग कोण दिया है। उन्होंने बताया कि construction industry में लंबे hours कोई बिल्कुल नई बात नहीं है और उन्होंने अपने करियर के शुरुआती दौर में इसी तरह का काम देखा था।

हालांकि, दोनों घटनाओं के बीच अंतर समझना जरूरी है। सुब्रह्मण्यन की टिप्पणी एक contemporary corporate debate का हिस्सा थी, जबकि राजन अपने 1986–1994 के व्यक्तिगत अनुभव के बारे में बता रहे हैं। दोनों को एक ही परिस्थिति मानना सही नहीं होगा।

राजन ने लंबे काम के बारे में क्या कहा?

सोशल मीडिया पर जब लोगों ने उनके अनुभव पर सवाल किए, तब राजन ने अपने पुराने कामकाजी जीवन से जुड़े कुछ और पहलुओं पर प्रतिक्रिया दी। एक टिप्पणी में जब लंबे working hours और sleep deprivation को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि थकाऊ दिन के बाद उन्हें अच्छी नींद आती थी और कभी-कभार हुई नींद की कमी अगले दिन पूरी हो जाती थी।

उन्होंने यह भी कहा कि project work में कुछ lean periods आते थे, जब कर्मचारियों को आराम करने का अवसर मिल जाता था। उनके मुताबिक digitalisation के कारण कुछ सुधार भी हुए हैं। उन्होंने project business में margins के कम होने और एक ही व्यक्ति के लगातार ध्यान देने की जरूरत का भी जिक्र किया।

इन टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों की राय अलग-अलग रही। कुछ लोगों ने उनके अनुभव को construction industry की वास्तविकताओं से जोड़ा, जबकि कुछ ने इतने लंबे working hours को लेकर चिंता जताई।

यही अंतर इस चर्चा को दिलचस्प बनाता है। एक तरफ construction projects की deadlines, safety requirements और execution pressure हैं, तो दूसरी तरफ कर्मचारी का व्यक्तिगत जीवन, आराम और स्वास्थ्य है। आधुनिक workplace debate में इन दोनों के बीच संतुलन को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।

क्या construction industry में लंबे घंटे सामान्य हैं?

राजन ने अपनी प्रतिक्रिया में construction industry की तुलना दूसरे देशों से भी की। जब एक यूजर ने कहा कि अमेरिका या यूरोप में ऐसे working hours स्वीकार नहीं किए जाएंगे, तो राजन ने जवाब दिया कि अमेरिकी construction industry में भी परिस्थितियां ऐसी हो सकती हैं, हालांकि उन्होंने वहां बेहतर भुगतान की बात कही।

यह उनका व्यक्तिगत दृष्टिकोण है और इसे सभी देशों या सभी construction companies पर लागू नहीं किया जा सकता। Construction industry में काम की प्रकृति project location, contract, local labour rules, project deadline, employee role और संगठन की policies के अनुसार अलग हो सकती है।

फिर भी एक बात स्पष्ट है कि infrastructure और construction projects में site-based roles सामान्य office jobs से अलग operational demands रखते हैं। किसी bridge, metro, power plant, refinery, highway या बड़े building project पर काम करने वाली टीम को कई बार ऐसी परिस्थितियों में काम करना पड़ सकता है जहां काम का समय केवल fixed office hours तक सीमित नहीं रहता।

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हर कर्मचारी के लिए लगातार लंबे working hours उचित या आवश्यक हैं। यही वजह है कि आज employee safety, fatigue management और work-life balance पर भी अधिक ध्यान दिया जाता है।

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं भी बंटी हुई

राजन की पोस्ट पर प्रतिक्रियाएं एक जैसी नहीं थीं। कुछ लोगों ने उनके अनुभव को पुराने construction work culture की वास्तविक तस्वीर बताया। वहीं कई लोगों ने कहा कि लंबे working hours को उपलब्धि या गर्व की बात के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।

एक यूजर ने इसे अत्यधिक शोषणकारी व्यवस्था के रूप में वर्णित किया और construction sector में काम के घंटे तथा worker safety पर सवाल उठाए। दूसरे लोगों ने भी इस तरह के schedules को लेकर चिंता जताई।

कुछ प्रतिक्रियाओं में यह सवाल भी उठाया गया कि अगर किसी project को पूरा करने के लिए लगातार 12–14 घंटे काम कराना पड़ता है तो क्या समस्या का समाधान कर्मचारियों के working hours बढ़ाना होना चाहिए या manpower और project planning को बेहतर करना चाहिए।

यह सवाल केवल L&T तक सीमित नहीं है। Infrastructure industry में project deadlines और manpower planning के बीच संतुलन एक व्यापक management challenge है।

एक अन्य पूर्व कर्मचारी ने भी अलग अनुभव साझा किया

सोशल मीडिया चर्चा में एक अन्य व्यक्ति ने अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि construction site पर काम करने के बाद सामान्य 9 से 6 वाली office job उन्हें कुछ समय तक फीकी लगती थी। राजन ने इस टिप्पणी पर सहमति जताई।

यह प्रतिक्रिया बताती है कि site-based work का अनुभव हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। कुछ लोगों को लगातार बदलते project environment, field work और execution की जिम्मेदारी पसंद आ सकती है, जबकि दूसरे लोग नियमित office schedule को ज्यादा सुविधाजनक मान सकते हैं।

किसी भी workplace की वास्तविकता समझने के लिए कर्मचारियों की भूमिका, व्यक्तिगत पसंद और project circumstances को ध्यान में रखना जरूरी है।

L&T के कामकाज को लेकर पुरानी बहस फिर सामने

L&T भारत की प्रमुख engineering, construction और infrastructure कंपनियों में से एक है। इसके प्रोजेक्ट्स अलग-अलग infrastructure और industrial क्षेत्रों में फैले रहे हैं। इसलिए कंपनी की working culture से जुड़ी कोई भी सार्वजनिक चर्चा जल्दी व्यापक attention हासिल करती है।

2025 में चेयरमैन एस.एन. सुब्रह्मण्यन की working-hours वाली टिप्पणी के बाद भी यही हुआ था। उस समय कंपनी के बाहर work-life balance पर चर्चा हुई और कर्मचारियों के लंबे working hours को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं।

अब पूर्व कर्मचारी के 1980s और 1990s के अनुभव से यह बहस फिर जुड़ गई है। हालांकि राजन ने जिस period की बात की है, वह आज से कई दशक पुराना है। इसलिए उनके अनुभव को वर्तमान L&T employees की working conditions का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए।

यह distinction जरूरी है क्योंकि किसी कंपनी की policies और working environment समय के साथ बदल सकते हैं। Technology, labour regulations, HR systems, safety practices और project management में भी पिछले तीन दशकों में काफी बदलाव आया है।

Digitalisation से क्या बदला?

राजन ने अपनी सोशल मीडिया प्रतिक्रिया में digitalisation के कारण कुछ improvements आने की बात भी कही। Construction industry में technology का इस्तेमाल पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है।

आज project management software, digital reporting, mobile communication, remote monitoring, drones, Building Information Modelling यानी BIM और अन्य digital tools की मदद से project progress को पहले की तुलना में अलग तरीके से track किया जा सकता है।

पहले जिस जानकारी को पहुंचाने के लिए कई बार व्यक्तिगत रूप से साइट पर मौजूद रहना पड़ता था, उसका कुछ हिस्सा अब digital systems से monitor किया जा सकता है। इससे communication और documentation की प्रक्रिया में बदलाव आया है।

फिर भी physical construction का काम site पर ही होता है। मशीनरी, material handling, structural work, safety inspection और installation जैसे कई कामों के लिए कर्मचारियों की physical presence आवश्यक रहती है। इसलिए technology के बावजूद site-based workforce की जरूरत खत्म नहीं हुई है।

क्या लंबे working hours से productivity बढ़ती है?

यही सवाल इस पूरी चर्चा के केंद्र में है। लंबे समय तक काम करने का अर्थ हमेशा ज्यादा productivity होना नहीं है। किसी कर्मचारी की efficiency पर fatigue, concentration, safety और recovery time का भी प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर, construction project में कुछ phases ऐसे हो सकते हैं जहां अतिरिक्त समय की जरूरत पड़ती है। Deadline के करीब काम बढ़ सकता है या किसी critical activity के कारण टीम को अतिरिक्त hours देने पड़ सकते हैं।

इसलिए workplace experts आम तौर पर केवल total working hours देखने के बजाय काम की quality, employee safety, project planning और sustainable productivity को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

राजन के अनुभव में project manager का सामने रहकर काम करना और पूरी टीम का project की जरूरत के अनुसार लंबे समय तक काम करना उस दौर की कार्यशैली का हिस्सा था। आज के workplace में organizations को productivity के साथ employee well-being पर भी ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया जाता है।

क्या यह L&T की मौजूदा working culture की तस्वीर है?

इस सवाल का जवाब केवल राजन के अनुभव से नहीं दिया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने 1986 से 1994 के अनुभव के बारे में बात की है। इसलिए इसे वर्तमान समय में L&T के हर project या कर्मचारी की working condition के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

वर्तमान कर्मचारियों की working hours, leave policy, site conditions और employee benefits अलग-अलग roles और projects के अनुसार हो सकते हैं। राजन की पोस्ट में भी उनका अनुभव historical context में है।

इसलिए खबर का मुख्य तथ्य यह है कि एक पूर्व कर्मचारी ने अपने पुराने L&T Construction site experience को सार्वजनिक रूप से साझा किया है और इस अनुभव ने भारत में work-life balance की पहले से चल रही बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।

चार घंटे की permission वाली बात क्यों चर्चा में आई?

राजन की “चार घंटे की permission” वाली बात इसलिए लोगों का ध्यान खींच रही है क्योंकि यह बताती है कि project-site employees की निजी जिंदगी और काम के बीच संतुलन किस तरह अलग तरीके से manage किया जाता था। बैंकिंग, पोस्ट भेजना, घर फोन करना या haircut जैसी सामान्य चीजों के लिए भी उन्हें working day के बीच permission लेनी पड़ती थी।

आज के समय में कई workplaces में ऐसी personal errands के लिए leave, flexible hours, remote work या अन्य विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। लेकिन construction site की location और project requirements इन विकल्पों को सीमित कर सकती हैं।

इसलिए राजन का अनुभव उस समय के site-based employment model की एक झलक देता है, जिसमें कर्मचारी और project के बीच समय का संबंध काफी सीधा था।

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http://L&T Construction site पर लंबे working hours को लेकर पूर्व कर्मचारी का अनुभव

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