अमेरिका में करीब 65 साल बाद किसी अमेरिकी सैन्य कैदी को मौत की सजा दिए जाने का रास्ता साफ हुआ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पूर्व अमेरिकी सेना मेजर और Army psychiatrist निडाल मलिक हसन (Nidal Malik Hasan) को firing squad यानी गोली चलाने वाली सैन्य टीम के जरिए मौत की सजा देने की मंजूरी दे दी है।
हसन ने नवंबर 2009 में टेक्सास के Fort Hood सैन्य अड्डे पर गोलीबारी की थी। इस हमले में 13 लोगों की मौत हुई थी और 32 लोग घायल हुए थे। हमले के दौरान हसन ने धार्मिक नारा “Allahu Akbar” लगाया था। हालांकि इस घटना को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी एक व्यक्ति के हिंसक अपराध को पूरे धर्म या समुदाय से जोड़ना सही नहीं है।
हसन को 2013 में सैन्य अदालत ने हत्या और हत्या के प्रयास के मामलों में दोषी ठहराया था और मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद से वह अमेरिकी सैन्य Death Row में था। अब Defense Secretary Pete Hegseth की सिफारिश पर राष्ट्रपति ट्रंप ने execution को मंजूरी दी है।
हालांकि अभी execution की तारीख तय नहीं हुई है। Pentagon के अनुसार Secretary of the Army समय और स्थान तय करेंगे। इसके अलावा कानूनी प्रक्रिया और संभावित अपील भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
65 साल बाद अमेरिकी सेना में फिर मौत की सजा
इस मामले की सबसे बड़ी खासियत यही है कि अमेरिकी सेना ने 1961 के बाद किसी military death sentence को execute नहीं किया है।
अमेरिकी Army के आधिकारिक इतिहास के अनुसार सैन्य न्याय व्यवस्था के तहत आखिरी execution Private John A. Bennett की 1961 में हुई थी। उसे rape और attempted murder के मामले में दोषी ठहराया गया था और फांसी दी गई थी।
अगर निडाल हसन की execution वास्तव में होती है तो वह 65 साल से ज्यादा समय बाद पहली अमेरिकी सैन्य execution होगी।
यही कारण है कि इस मामले को अमेरिकी military justice system के इतिहास में बेहद असामान्य माना जा रहा है।
कौन है निडाल मलिक हसन?
निडाल मलिक हसन अमेरिकी सेना में Major और psychiatrist था। यानी उसका काम सैनिकों से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में था।
वह अमेरिकी सेना में कार्यरत था और 2009 में उसकी पोस्टिंग Fort Hood, Texas में थी। उस समय Fort Hood अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य ठिकानों में से एक था और विदेशों में तैनाती से पहले सैनिक यहां processing और medical procedures से गुजरते थे।
5 नवंबर 2009 को हसन Soldier Readiness Processing Center में पहुंचा। वहां बड़ी संख्या में सैनिक Afghanistan और अन्य combat deployments के लिए तैयारियों से गुजर रहे थे।
कुछ ही समय बाद उसने वहां गोलीबारी शुरू कर दी।
Fort Hood में क्या हुआ था?
5 नवंबर 2009 का दिन Fort Hood के इतिहास के सबसे भयावह दिनों में शामिल हो गया।
हसन ने एक handgun से सैनिकों पर गोली चलानी शुरू की। रिपोर्टों के अनुसार उसकी handgun पर laser sight लगा था।
हमले में 13 लोगों की मौत हुई और 32 लोग घायल हुए। मृतकों में 12 active-duty soldiers और एक retired soldier शामिल था, जो civilian employee के रूप में काम कर रहा था।
हमले के दौरान हसन ने “Allahu Akbar” चिल्लाया था, जिसका अर्थ अरबी में “ईश्वर महान है” होता है। इस तथ्य का उल्लेख जांच और बाद की अदालती कार्यवाही में हुआ।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी धार्मिक वाक्य का इस्तेमाल किसी अपराधी द्वारा किया जाना उस धर्म के सभी अनुयायियों के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं देता।
पुलिस की गोली से हसन हुआ घायल
गोलीबारी के दौरान civilian police officer ने हसन पर गोली चलाई।
इस कार्रवाई में हसन गंभीर रूप से घायल हुआ और बाद में वह partially paralyzed हो गया। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
हमले के बाद उसकी चिकित्सा और कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई और मामला सैन्य अदालत तक पहुंचा।
हसन ने हमले की जिम्मेदारी स्वीकार की
2013 में जब उसका court-martial हुआ तो हसन ने काफी हद तक खुद अपना बचाव किया।
उसने हमले की जिम्मेदारी से इनकार करने की कोशिश नहीं की। अदालत में उसने यह तर्क दिया कि वह अमेरिकी सैन्य अभियानों में मुस्लिमों के खिलाफ कार्रवाई का विरोध करता था।
रिपोर्टों के अनुसार उसने खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जिसने युद्ध के संदर्भ में अपना पक्ष बदल लिया था। अभियोजन पक्ष ने हमले को Al-Qaeda-inspired extremist ideology से जुड़ा बताया।
उसके court-martial में यह भी सामने आया कि वह Afghanistan में deployment को लेकर चिंतित था और उसका मानना था कि अमेरिकी सैन्य अभियान मुस्लिमों के खिलाफ था।
2013 में सुनाई गई मौत की सजा
2013 में military jury ने हसन को हत्या और हत्या के प्रयास के मामलों में दोषी ठहराया।
Stars and Stripes के अनुसार उसे 13 counts of premeditated murder और 32 counts of attempted premeditated murder में दोषी ठहराया गया था। उसे मौत की सजा सुनाई गई।
Army के legal history में भी दर्ज है कि 2013 में General Court-Martial ने उसे दोषी ठहराकर death sentence सुनाया था।
इसके बाद हसन को Fort Leavenworth, Kansas स्थित military prison में Death Row पर रखा गया।
इतने साल तक execution क्यों नहीं हुई?
2013 में मौत की सजा मिलने के बावजूद हसन को तुरंत execute नहीं किया गया।
अमेरिकी military justice system में death sentence के बाद कई कानूनी प्रक्रियाएं होती हैं। इसमें appellate review और राष्ट्रपति की मंजूरी जैसे चरण शामिल होते हैं।
Army के 2026 के कानूनी विश्लेषण के अनुसार military death sentence को execute करने के लिए राष्ट्रपति की approval आवश्यक होती है।
यही वजह है कि 2013 में sentence मिलने के बाद भी हसन को वर्षों तक Death Row में रखा गया।
Supreme Court भी नहीं सुन पाया मामला
हसन ने अपनी death sentence को चुनौती देने के लिए आगे कानूनी रास्तों का इस्तेमाल किया।
उसने अमेरिकी Supreme Court से भी मामले की समीक्षा की मांग की थी। लेकिन Supreme Court ने पिछले वर्ष उसके मामले को review करने से इनकार कर दिया था।
इसके बाद उसकी death sentence के खिलाफ उपलब्ध कानूनी विकल्प काफी सीमित रह गए, हालांकि execution से पहले भी कुछ federal legal challenges की संभावना बनी रह सकती है।
Economic Times की रिपोर्ट के मुताबिक हसन आगे federal court में habeas corpus appeal के जरिए execution को delay करने की कोशिश कर सकता है।
ट्रंप ने execution को मंजूरी क्यों दी?
Defense Secretary Pete Hegseth ने हसन की execution की सिफारिश राष्ट्रपति ट्रंप से की।
Pentagon spokesperson Sean Parnell के अनुसार ट्रंप ने Army firing squad द्वारा execution को मंजूरी दी है।
इसका मतलब यह नहीं है कि उसी समय execution हो जाएगी।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद भी Army को execution की तारीख, स्थान और अन्य procedural requirements तय करनी होंगी।
Pentagon ने कहा है कि Secretary of the Army execution का समय और स्थान तय करेंगे।
गोली मारकर मौत की सजा क्यों?
इस मामले में अमेरिका ने firing squad यानी गोली मारकर execution का तरीका चुना है।
यह तरीका अमेरिकी civilian justice system में बेहद दुर्लभ है, लेकिन कुछ राज्यों में इसे कानूनी विकल्प के रूप में रखा गया है।
2025 में South Carolina में firing squad के जरिए executions हुई थीं। इससे पहले अमेरिका में यह तरीका लंबे समय तक लगभग इस्तेमाल नहीं हुआ था।
Military system में firing squad का इतिहास इससे भी पुराना है।
लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि अमेरिकी सेना की आखिरी execution 1961 में hanging से हुई थी।
अमेरिकी सेना में आखिरी firing squad execution कब हुई थी?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है।
अमेरिकी सैन्य न्याय व्यवस्था में आखिरी execution 1961 में हुई थी, लेकिन आखिरी ज्ञात Army firing squad execution 1945 में हुई थी।
Death Penalty Information Center और Stars and Stripes के अनुसार 1945 में Private Eddie Slovik को France में firing squad द्वारा execute किया गया था। वह desertion के मामले में दोषी पाया गया था।
इसलिए अगर हसन की execution firing squad से होती है, तो यह अमेरिकी सेना में इस तरीके से लगभग आठ दशक बाद पहली execution होगी।
65 साल और करीब 81 साल का फर्क
इस खबर में दो अलग historical records को समझना जरूरी है।
Military execution: आखिरी बार 1961 में हुई थी। इसलिए हसन की execution होने पर यह 65 साल से ज्यादा समय बाद पहली अमेरिकी military execution होगी।
Military firing squad: आखिरी ज्ञात Army firing squad execution 1945 में हुई थी। इसलिए हसन की execution इस method के मामले में इससे भी लंबे अंतराल के बाद होगी।
यही वजह है कि headline में “65 साल में पहला मामला” और article में firing squad के लिए अलग historical context देना जरूरी है।
क्या अभी हसन को गोली मार दी गई है?
नहीं।
यह खबर execution की मंजूरी की है, execution होने की नहीं।
Pentagon ने बताया है कि Army Secretary को समय और स्थान तय करना है। इसके अलावा संभावित legal challenges भी execution की timing को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए “अमेरिकी सैनिक को गोली मारकर मौत की सजा दी गई” लिखना गलत होगा।
सही wording है—“गोली मारकर मौत की सजा देने की मंजूरी मिली” या “firing squad execution approved.”
हसन के खिलाफ कितने मामले थे?
Military court ने हसन को 13 लोगों की हत्या और 32 लोगों की हत्या के प्रयास से संबंधित मामलों में दोषी ठहराया।
Army के legal review में भी बताया गया है कि 2009 के Fort Hood attack में उसने 13 लोगों की हत्या की और 32 अन्य लोगों की हत्या का प्रयास किया।
इसी गंभीरता के कारण military jury ने death sentence सुनाई।
क्या वह अभी भी अमेरिकी सेना का सैनिक है?
हसन को अब active-duty soldier के रूप में नहीं देखा जाता। वह former Army Major है और military prison में condemned prisoner के रूप में रखा गया है।
उसकी military death sentence वर्षों से लंबित थी।
अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद Army system में execution की अगली procedural प्रक्रिया शुरू होगी।
अमेरिकी military death row पर कितने कैदी हैं?
Army के 2026 के legal review के अनुसार वर्तमान में चार कैदी military Death Row पर हैं। इनमें निडाल हसन भी शामिल है।
इनमें Ronald Gray, Hasan Akbar और Timothy Hennis जैसे अन्य condemned prisoners भी शामिल हैं।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अमेरिकी military death penalty का इस्तेमाल बेहद दुर्लभ है।
2008 में भी एक military execution की कोशिश हुई थी
अमेरिका में इससे पहले भी एक military death sentence को execute करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी थी।
Army Specialist Ronald Gray को 1980s में कई गंभीर अपराधों के लिए death sentence मिली थी। 2008 में तत्कालीन राष्ट्रपति George W. Bush ने उसकी execution को approve किया था।
लेकिन federal judge ने execution पर रोक लगा दी और Gray की execution नहीं हो सकी। वह military Death Row पर बना रहा।
इससे पता चलता है कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद भी कानूनी प्रक्रिया execution को रोक सकती है।
अमेरिकी सेना में death penalty इतनी दुर्लभ क्यों है?
Military death penalty बहुत कम मामलों में लागू हुई है।
Army के अपने legal review के अनुसार 1951 में Uniform Code of Military Justice के आने के बाद से अमेरिकी military ने कुल 10 executions की हैं और ये सभी hanging से हुई थीं। आखिरी execution 1961 में हुई।
इसके बाद military justice system में death penalty मौजूद रही, लेकिन execution practically बंद रही।
कानूनी अपील, presidential review और अन्य procedural safeguards के कारण death sentences लंबे समय तक pending रह सकती हैं।
क्या firing squad अमेरिका में कानूनी है?
कुछ अमेरिकी राज्यों में firing squad legal execution method है।
Federal level पर भी Trump administration ने हाल में execution के वैकल्पिक तरीकों को लेकर व्यवस्था में बदलाव किए हैं। Reuters के अनुसार firing squad के साथ electrocution और gas asphyxiation जैसे तरीकों को भी federal execution options के संदर्भ में आगे बढ़ाया गया है।
इसके पीछे एक कारण lethal injection drugs की उपलब्धता और execution procedures से जुड़ी कठिनाइयां भी बताई गई हैं।
हालांकि military execution की प्रक्रिया civilian federal execution से अलग कानूनी framework के तहत चलती है।
Fort Hood हमला अमेरिका के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?
Fort Hood shooting ने अमेरिका में military personnel की सुरक्षा और domestic extremism को लेकर बड़ी बहस पैदा की थी।
यह हमला ऐसे स्थान पर हुआ जहां अमेरिकी सैनिक विदेशों में deployment की तैयारी कर रहे थे।
हमले के बाद यह सवाल उठा कि क्या military personnel के बीच extremist warning signs को पहले पहचाना जा सकता था और क्या किसी व्यक्ति की मानसिक स्वास्थ्य तथा ideological activity को लेकर मौजूद संकेतों को बेहतर तरीके से जांचा जाना चाहिए था।
बाद के वर्षों में military installations पर सुरक्षा और threat assessment को लेकर भी चर्चा बढ़ी।
हमले का धार्मिक संदर्भ कैसे सामने आया?
अदालत और जांच के दौरान यह सामने आया कि हसन अमेरिकी military operations से नाराज था और उसने मुस्लिमों के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई का विरोध किया था।
हमले के दौरान उसके द्वारा “Allahu Akbar” कहने की बात भी सामने आई।
अभियोजन पक्ष ने उसके विचारों और online contacts को extremist ideology से जोड़ा था। रिपोर्टों में उसका संबंध Anwar al-Awlaki जैसे Al-Qaeda-linked extremist cleric से भी बताया गया।
लेकिन इस पूरी घटना को धार्मिक समुदाय के व्यापक व्यवहार के रूप में देखना उचित नहीं है। यह एक convicted individual’s violent criminal act था।
अब आगे क्या होगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण कदम Secretary of the Army द्वारा execution की तारीख और स्थान तय करना होगा।
Army के 2026 legal review के अनुसार presidential approval के बाद Secretary of the Army method, date और location से जुड़े procedural steps तय करते हैं। मौजूदा नियमों के अनुसार राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद execution date के लिए 60 से 150 दिनों की window का प्रावधान बताया गया है।
हालांकि अगर हसन की ओर से कोई नया legal challenge स्वीकार होता है तो प्रक्रिया में बदलाव या देरी संभव है।
इसलिए अभी exact execution date बताना जल्दबाजी होगी।
इस फैसले पर विरोध भी
Death penalty को लेकर अमेरिका में लंबे समय से विवाद रहा है।
कुछ organizations और human-rights groups capital punishment का विरोध करते हैं। Reuters के अनुसार Death Penalty Action ने ट्रंप के फैसले की आलोचना की है।
दूसरी ओर, पीड़ितों के परिवार और समर्थक लंबे समय से न्याय की मांग करते रहे हैं।
हसन के मामले में भी बहस केवल उसके अपराध तक सीमित नहीं है। इसमें military justice, death penalty, execution methods और presidential authority जैसे कई कानूनी और नैतिक मुद्दे शामिल हैं।
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http://Fort Hood हमले के आरोपी Nidal Hasan की firing squad execution को मंजूरी



