प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को ओडिशा के जटनी, भुवनेश्वर के पास भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए डेटा सेंटर और साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट का उद्घाटन किया। करीब ₹169 करोड़ के निवेश से तैयार यह सुविधा देश के महत्वपूर्ण वित्तीय डेटा और डिजिटल पेमेंट सिस्टम की सुरक्षा तथा निरंतरता को मजबूत करने के लिए बनाई गई है।
नया डेटा सेंटर RBI के नवी मुंबई स्थित डेटा सेंटर के लिए बैकअप और आपदा के समय काम आने वाले वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यदि किसी तकनीकी खराबी, प्राकृतिक आपदा या दूसरी गंभीर समस्या के कारण एक केंद्र प्रभावित होता है, तो वैकल्पिक व्यवस्था से जरूरी सेवाओं को जारी रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में बैंकिंग या पेमेंट सिस्टम कभी बाधित नहीं होंगे।
इस परिसर में चार आधुनिक डेटा सेंटर सुविधाएं हैं, जिनमें RBI के महत्वपूर्ण पेमेंट और सेटलमेंट सिस्टम समेत अन्य प्रमुख डिजिटल प्रणालियों को होस्ट करने की योजना है। इसे Uptime Institute से Tier IV प्रमाणन भी मिला है, जो डेटा सेंटर की उपलब्धता और इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती के लिए उच्च स्तर का मानक माना जाता है।
इसके साथ स्थापित साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा क्षेत्र यानी BFSI के विशेषज्ञों को प्रशिक्षण देने, शोध करने और नई तकनीकों पर क्षमता विकसित करने में मदद करेगा।
ओडिशा में कहां बना है RBI का नया डेटा सेंटर?
RBI का नया डेटा सेंटर ओडिशा के जटनी क्षेत्र में Info Valley-II में बनाया गया है। यह भुवनेश्वर के नजदीक स्थित है और करीब 18.55 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है।
इस परियोजना की आधारशिला 22 मार्च 2023 को तत्कालीन RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने रखी थी। निर्माण का उद्देश्य केंद्रीय बैंक की कंप्यूटिंग जरूरतों को पूरा करना और महत्वपूर्ण वित्तीय प्रणालियों के लिए अधिक सुरक्षित तथा भरोसेमंद डिजिटल ढांचा तैयार करना है।
डेटा सेंटर आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। इनमें सर्वर, स्टोरेज सिस्टम, नेटवर्किंग उपकरण और सुरक्षा तकनीक के जरिए डिजिटल जानकारी तथा कंप्यूटिंग सेवाओं को संचालित किया जाता है।
RBI जैसे केंद्रीय बैंक के लिए यह व्यवस्था और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके तकनीकी सिस्टम का संबंध वित्तीय संस्थानों, भुगतान व्यवस्था और दूसरी महत्वपूर्ण सेवाओं से होता है। किसी प्रमुख सिस्टम में लंबे समय तक रुकावट आने से बैंकों और भुगतान नेटवर्क के संचालन पर असर पड़ सकता है।
ओडिशा में नया केंद्र बनने से RBI के पास महत्वपूर्ण तकनीकी सुविधाओं के संचालन के लिए एक अतिरिक्त भौगोलिक स्थान उपलब्ध होगा। इससे किसी एक क्षेत्र में गंभीर समस्या होने की स्थिति में जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
मुंबई वाला डेटा सेंटर खराब हुआ तो क्या होगा?
इस परियोजना को समझने के लिए बैकअप डेटा सेंटर का मतलब जानना जरूरी है। सामान्य तौर पर बैंक और वित्तीय संस्थान अपने महत्वपूर्ण डिजिटल डेटा और सेवाओं को सुरक्षित रखने के लिए एक से ज्यादा तकनीकी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं।
RBI का नवी मुंबई स्थित केंद्र प्रमुख डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा है, जबकि ओडिशा की नई सुविधा वैकल्पिक व्यवस्था और आपदा से उबरने की क्षमता को मजबूत करेगी।
मान लीजिए कि किसी बड़े तकनीकी दोष, बिजली आपूर्ति में गंभीर समस्या, आग या प्राकृतिक आपदा के कारण किसी डेटा सेंटर का संचालन प्रभावित हो जाता है। ऐसी स्थिति में दूसरे केंद्र से जरूरी सेवाओं को बहाल करने की योजना काम आ सकती है।
इस प्रक्रिया को डिजास्टर रिकवरी यानी आपदा के बाद सिस्टम को दोबारा चालू करने की व्यवस्था कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि महत्वपूर्ण डेटा सुरक्षित रहे और आवश्यक सेवाओं को यथासंभव कम समय में फिर से शुरू किया जा सके।
हालांकि, हर सिस्टम का बैकअप एक जैसा नहीं होता। कुछ प्रणालियों में डेटा लगातार अपडेट होता है, जबकि कुछ में बहाली के लिए अतिरिक्त समय लग सकता है। इसके अलावा, दूसरे केंद्र पर सेवाएं स्थानांतरित करने के लिए तकनीकी प्रक्रियाएं, नेटवर्क कनेक्टिविटी और सुरक्षा जांच भी जरूरी होती हैं।
इसलिए यह कहना सही होगा कि ओडिशा का डेटा सेंटर बैंकिंग और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती बढ़ाएगा। लेकिन किसी भी परिस्थिति में सभी सेवाएं बिना किसी रुकावट के चलती रहेंगी, इसकी पूर्ण गारंटी नहीं दी जा सकती।
डिजिटल पेमेंट और बैंकिंग सिस्टम को कैसे मिलेगा फायदा?
आज भारत में बैंकिंग का बड़ा हिस्सा डिजिटल तकनीक पर निर्भर है। लोग मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग, कार्ड, UPI और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भुगतान करते हैं। व्यापारियों, कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के लिए भी डिजिटल पेमेंट रोजमर्रा के काम का अहम हिस्सा बन चुका है।
ऐसे सिस्टम को चलाने के लिए सर्वर, डेटा स्टोरेज, नेटवर्क और सुरक्षा व्यवस्था लगातार काम करती रहती है। यदि इनसे जुड़ा कोई महत्वपूर्ण हिस्सा प्रभावित होता है, तो लेन-देन में देरी या कुछ सेवाओं में अस्थायी समस्या हो सकती है।
RBI का नया डेटा सेंटर महत्वपूर्ण पेमेंट और सेटलमेंट सिस्टम को होस्ट करने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य वित्तीय सेवाओं की विश्वसनीयता, दक्षता और उपलब्धता को मजबूत करना है।
यदि किसी तकनीकी समस्या के दौरान वैकल्पिक सिस्टम का इस्तेमाल करना पड़े, तो मजबूत बैकअप व्यवस्था से सेवाओं को बहाल करने में मदद मिल सकती है। इससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए संचालन जारी रखने की तैयारी बेहतर हो सकती है।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हर बैंक का अपना सर्वर इसी केंद्र पर चलेगा या सभी UPI ट्रांजैक्शन सीधे इसी भवन से संचालित होंगे। भुगतान व्यवस्था कई संस्थानों, नेटवर्कों और तकनीकी प्रणालियों के तालमेल से काम करती है। RBI का डेटा सेंटर इस व्यापक वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्या UPI, ATM और ऑनलाइन बैंकिंग कभी बंद नहीं होंगे?
नया डेटा सेंटर बनने के बाद यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या अब UPI, ATM और ऑनलाइन बैंकिंग में कभी रुकावट नहीं आएगी।
इसका जवाब है—नहीं, ऐसी गारंटी नहीं दी जा सकती।
डिजिटल पेमेंट सिस्टम में कई स्तर होते हैं। इनमें बैंक के अपने सर्वर, भुगतान नेटवर्क, इंटरनेट कनेक्टिविटी, मोबाइल नेटवर्क, ऐप और दूसरे तकनीकी सेवा प्रदाता शामिल हो सकते हैं। किसी भी स्तर पर समस्या आने से लेन-देन प्रभावित हो सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी ग्राहक के मोबाइल नेटवर्क में समस्या है, तो UPI ऐप काम नहीं कर सकता। यदि किसी बैंक के सिस्टम में तकनीकी खराबी है, तो उसके ग्राहकों को भुगतान या बैलेंस देखने में परेशानी हो सकती है। इसी तरह, किसी कार्ड नेटवर्क या ATM से जुड़ी समस्या भी कुछ सेवाओं को प्रभावित कर सकती है।
RBI का बैकअप डेटा सेंटर ऐसी व्यापक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है। इसका फायदा विशेष रूप से उन महत्वपूर्ण प्रणालियों को हो सकता है, जिनकी निरंतरता केंद्रीय बैंक के कामकाज और वित्तीय क्षेत्र के लिए जरूरी है।
इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि नए केंद्र से सिस्टम की मजबूती बढ़ सकती है और कुछ प्रकार की तकनीकी आपदाओं के असर को कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन सभी तरह की डिजिटल पेमेंट समस्याएं खत्म हो जाएंगी, ऐसा दावा करना सही नहीं होगा।
डेटा सेंटर को मिला Tier IV प्रमाणन क्या है?
ओडिशा स्थित इस सुविधा को Uptime Institute से Tier IV प्रमाणन मिला है। यह डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक उच्च स्तर का वर्गीकरण है, जिसमें सिस्टम की उपलब्धता और तकनीकी खराबी के दौरान संचालन जारी रखने की क्षमता पर जोर दिया जाता है।
सरल शब्दों में, Tier IV जैसी व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि किसी एक उपकरण या इंफ्रास्ट्रक्चर हिस्से में खराबी आने पर पूरा डेटा सेंटर तुरंत बंद न हो जाए। इसके लिए डिजाइन में अतिरिक्त क्षमता और स्वतंत्र वैकल्पिक व्यवस्थाओं का महत्व होता है।
ऐसे डेटा सेंटरों में बिजली, कूलिंग और दूसरे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मजबूत डिजाइन की जरूरत होती है। सर्वर लगातार काम करते हैं, इसलिए उन्हें सही तापमान, भरोसेमंद बिजली और सुरक्षित नेटवर्क वातावरण उपलब्ध कराना जरूरी होता है।
हालांकि, Tier IV प्रमाणन का मतलब यह नहीं है कि डेटा सेंटर में कभी तकनीकी खराबी नहीं हो सकती। प्रमाणन इंफ्रास्ट्रक्चर के डिजाइन और संबंधित मानकों के अनुरूप व्यवस्था को दर्शाता है। वास्तविक संचालन के लिए नियमित रखरखाव, सुरक्षा परीक्षण और प्रशिक्षित कर्मचारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
इस तरह का प्रमाणन RBI के नए केंद्र की तकनीकी मजबूती को दर्शाता है, लेकिन किसी भी डिजिटल सिस्टम की तरह इसके संचालन में भी जोखिमों का प्रबंधन जरूरी रहेगा।
डेटा सेंटर के लिए जटनी को क्यों चुना गया?
रिपोर्टों के मुताबिक, इस स्थान को चुनने में भौगोलिक स्थिरता और जोखिमों को कम करने जैसे पहलुओं पर विचार किया गया। अधिकारियों के अनुसार, यह क्षेत्र कुछ अधिक भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों और संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से दूर है।
डेटा सेंटर की जगह चुनते समय केवल जमीन और भवन की उपलब्धता नहीं देखी जाती। बिजली आपूर्ति, इंटरनेट कनेक्टिविटी, बाढ़ या भूकंप जैसे प्राकृतिक जोखिम, सुरक्षा और आपात स्थिति में संचालन जारी रखने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है।
एक ही क्षेत्र में सभी महत्वपूर्ण तकनीकी सुविधाएं होने से कुछ प्रकार के साझा जोखिम बढ़ सकते हैं। यदि उस क्षेत्र में कोई बड़ी आपदा आती है, तो एक साथ कई सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं। अलग-अलग भौगोलिक स्थानों पर सुविधाएं बनाने से इस तरह के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
RBI के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि केंद्रीय बैंक की तकनीकी व्यवस्था वित्तीय क्षेत्र के महत्वपूर्ण कामकाज से जुड़ी है। ओडिशा में नया केंद्र उपलब्ध होने से उसकी भौगोलिक विविधता और आपदा से उबरने की क्षमता मजबूत हो सकती है।
₹169 करोड़ की परियोजना में क्या-क्या शामिल है?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डेटा सेंटर और साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से जुड़ी सुविधाओं पर करीब ₹169 करोड़ का निवेश किया गया है। यह परिसर लगभग 18.55 एकड़ क्षेत्र में फैला है।
इस परियोजना के दो प्रमुख हिस्से हैं। पहला, डेटा सेंटर, जहां RBI के महत्वपूर्ण डिजिटल सिस्टम और पेमेंट-सेटलमेंट से जुड़ी सुविधाओं को होस्ट किया जाएगा। दूसरा, साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, जो वित्तीय क्षेत्र में तकनीकी कौशल और सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए बनाया गया है।
डेटा सेंटर की लागत केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं होती। इसमें सर्वर, स्टोरेज उपकरण, नेटवर्क, बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था, कूलिंग सिस्टम, आग से सुरक्षा, निगरानी और साइबर सुरक्षा जैसे कई पहलू शामिल होते हैं।
ऐसी सुविधाओं के संचालन में भी नियमित खर्च आता है। उपकरणों का रखरखाव, सुरक्षा अपडेट, बिजली की उपलब्धता और विशेषज्ञ कर्मचारियों की जरूरत लगातार बनी रहती है।
इसलिए इस परियोजना का महत्व केवल इसके निर्माण पर हुए खर्च से नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि यह लंबे समय तक वित्तीय व्यवस्था को कितना सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने में मदद करती है।
साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट का क्या काम होगा?
डेटा सेंटर के साथ स्थापित साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट का उद्देश्य वित्तीय क्षेत्र में साइबर सुरक्षा और तकनीकी विशेषज्ञता को मजबूत करना है।
बैंकिंग और डिजिटल भुगतान का विस्तार होने के साथ साइबर हमलों के तरीके भी बदल रहे हैं। फिशिंग, नकली वेबसाइट, डेटा चोरी, रैनसमवेयर और नेटवर्क पर हमले जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत होती है।
इस संस्थान में साइबर सुरक्षा, एंटरप्राइज टेक्नोलॉजी, शोध और कौशल विकास से जुड़े कार्यक्रमों पर ध्यान दिया जाएगा। इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी उभरती तकनीकों के वित्तीय क्षेत्र पर पड़ने वाले असर को समझने पर भी जोर होगा।
AI का इस्तेमाल साइबर सुरक्षा में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने और डेटा का विश्लेषण करने में मदद कर सकता है। वहीं, क्वांटम कंप्यूटिंग भविष्य में कंप्यूटिंग और क्रिप्टोग्राफी के कुछ पहलुओं को बदल सकती है। इसलिए वित्तीय संस्थानों को नई तकनीकों के संभावित लाभ और जोखिम दोनों समझने होंगे।
ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट का उद्देश्य केवल तकनीकी जानकारी देना नहीं, बल्कि वित्तीय क्षेत्र में ऐसी क्षमता विकसित करना भी है जिससे संस्थान नए साइबर खतरों का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।
डिजिटल भारत के लिए यह सुविधा क्यों अहम है?
भारत में डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारों तक, कई तरह के लेन-देन मोबाइल ऐप, कार्ड और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से किए जाते हैं।
इस बदलाव ने भुगतान को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ तकनीकी निर्भरता भी बढ़ी है। डिजिटल वित्तीय व्यवस्था में भरोसा बनाए रखने के लिए डेटा की सुरक्षा, सिस्टम की उपलब्धता और आपदा के समय संचालन जारी रखने की क्षमता जरूरी है।
RBI का नया डेटा सेंटर इसी व्यापक जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इससे केंद्रीय बैंक की कंप्यूटिंग क्षमता और वित्तीय क्षेत्र के लिए जरूरी डिजिटल आधार मजबूत हो सकता है।
साथ ही, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण से बैंकिंग क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों की क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है। डिजिटल अर्थव्यवस्था में तकनीकी ढांचे और प्रशिक्षित कर्मचारियों—दोनों की जरूरत होती है।
यह सुविधा ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब वित्तीय सेवाएं तेजी से डिजिटल हो रही हैं और साइबर सुरक्षा का महत्व बढ़ता जा रहा है।
उद्घाटन कार्यक्रम में कौन-कौन मौजूद रहे?
डेटा सेंटर और साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के उद्घाटन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा, ओडिशा के राज्यपाल ब्रजमोहन राम और मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
ओडिशा सरकार ने इस परियोजना को राज्य के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए महत्वपूर्ण बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि नई सुविधा राज्य की विकास यात्रा में एक और अध्याय जोड़ेगी।
यह परियोजना RBI की तकनीकी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ ओडिशा को वित्तीय और तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर के मानचित्र पर एक नई पहचान देने की क्षमता रखती है।
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