रणबीर कपूर और साई पल्लवी की फिल्म ‘रामायण: राइज ऑफ अ लेजेंड’ रिलीज होने के बाद एक नए विवाद में घिर गई है। फिल्म में माता सीता का किरदार निभा रहीं साई पल्लवी को एक्शन सीन में राक्षसों से लड़ते हुए दिखाया गया है। इस दृश्य को लेकर सोशल मीडिया पर दर्शकों की राय बंट गई है। कुछ लोगों ने इसे माता सीता के साहस और शक्ति का नया सिनेमाई चित्रण बताया, जबकि कई दर्शकों ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रसंग रामायण के पारंपरिक वर्णन से मेल खाता है।
विवाद का केंद्र वह दृश्य है जिसमें वनवास के दौरान भगवान राम के साथ माता सीता को भी राक्षसों की सेना से लड़ते दिखाया गया है। आलोचना करने वाले दर्शकों का कहना है कि खर-दूषण के प्रसंग में भगवान राम ने अकेले राक्षसों का सामना किया था और माता सीता को युद्धस्थल से दूर भेजा गया था। ऐसे में फिल्म में सीता को युद्ध करते दिखाना मूल कथा से अलग बदलाव है।
दूसरी ओर, फिल्म के निर्देशक नितेश तिवारी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने माता सीता के योद्धा स्वरूप के लिए ‘अद्भुत रामायण’ से प्रेरणा ली है। उनके मुताबिक, इस ग्रंथ में सीता का एक योद्धा राजकुमारी वाला रूप मिलता है। मेकर्स का तर्क है कि उन्होंने सीता के चरित्र को एक अलग आयाम देने के लिए इस परंपरा को फिल्म में शामिल किया है।
फिल्म में किस सीन को लेकर शुरू हुआ विवाद?
फिल्म में साई पल्लवी को माता सीता के रूप में दिखाया गया है। एक दृश्य में वह भगवान राम के साथ वन में राक्षसों से मुकाबला करती नजर आती हैं। इस सीन में सीता केवल राम के साथ मौजूद नहीं हैं, बल्कि वह भी युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाती दिखाई देती हैं।
फिल्म देखने के बाद कुछ दर्शकों ने सोशल मीडिया पर इस दृश्य पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि रामायण के लोकप्रिय और पारंपरिक वर्णन में खर-दूषण की सेना से युद्ध करते समय भगवान राम ने अकेले युद्ध किया था। उनके अनुसार, उस प्रसंग में माता सीता को युद्ध में शामिल दिखाना कथा के मूल स्वरूप को बदलने जैसा है।
कुछ दर्शकों ने यह भी सवाल उठाया कि अगर फिल्म रामायण पर आधारित है, तो उसमें ऐसे दृश्य क्यों जोड़े गए जो सभी प्रमुख रामायण परंपराओं में एक जैसे नहीं मिलते। वहीं, कुछ लोगों ने इस दृश्य का समर्थन करते हुए कहा कि सीता को केवल त्याग और सहनशीलता के प्रतीक के रूप में सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, भारतीय परंपरा में देवी सीता की शक्ति और सामर्थ्य के अलग-अलग वर्णन भी मौजूद हैं।
इस तरह विवाद केवल एक एक्शन सीन तक सीमित नहीं रहा। इसके साथ यह बहस भी जुड़ गई है कि धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कथा को बड़े पर्दे पर दिखाते समय निर्देशक को कितनी रचनात्मक स्वतंत्रता लेनी चाहिए।
नितेश तिवारी ने ‘अद्भुत रामायण’ का दिया हवाला
फिल्म के निर्देशक नितेश तिवारी ने लॉस एंजिल्स में फिल्म के प्रीमियर के दौरान मीडिया से बातचीत में सीता के एक्शन सीन को लेकर अपनी सोच बताई थी। उन्होंने कहा था कि टीम ने रामायण के अलग-अलग स्वरूपों और पात्रों के चित्रण को ध्यान में रखकर फिल्म की दुनिया तैयार की है।
तिवारी के मुताबिक, कुछ पात्रों के मामले में फिल्मकारों को रचनात्मक स्वतंत्रता लेने से बचना चाहिए, जबकि कुछ पात्रों के अलग-अलग रूप भारतीय परंपराओं में मिलते हैं। उन्होंने भगवान राम के चरित्र को लेकर कहा कि देश की अलग-अलग परंपराओं में भी उनका मूल स्वरूप भगवान राम का ही है।
माता सीता के बारे में निर्देशक ने कहा कि ‘अद्भुत रामायण’ में उनका योद्धा राजकुमारी वाला रूप मिलता है। इसी विचार से प्रेरणा लेकर फिल्म में सीता के एक्शन दृश्य रखे गए हैं। उनका मानना है कि इससे सीता के चरित्र में एक नया आयाम जुड़ता है।
मेकर्स की सफाई का मुख्य आधार यही है कि फिल्म में दिखाया गया योद्धा स्वरूप पूरी तरह बिना आधार के नहीं जोड़ा गया, बल्कि रामायण की एक अलग साहित्यिक परंपरा से प्रेरित है। हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बाद भी दर्शकों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
वाल्मीकि रामायण में खर-दूषण का प्रसंग क्या है?
इस विवाद को समझने के लिए पहले उस प्रसंग को समझना जरूरी है, जिसके आधार पर दर्शक फिल्म के दृश्य पर सवाल उठा रहे हैं। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में पंचवटी के वन में रहने के दौरान शूर्पणखा, खर और दूषण से जुड़ी घटनाओं का वर्णन मिलता है।
शूर्पणखा के अपमान के बाद खर-दूषण भगवान राम के विरुद्ध अपनी राक्षस सेना भेजते हैं। कथा के इस हिस्से में भगवान राम राक्षसों से युद्ध करते हैं। पारंपरिक वर्णन में राम युद्ध के लिए तैयार होते हैं और लक्ष्मण को सीता की सुरक्षा की जिम्मेदारी देते हैं। इसके बाद राम राक्षसों की सेना का सामना करते हैं।
इसी प्रसंग को लेकर फिल्म के दृश्य पर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि जब कथा में सीता को सुरक्षित स्थान पर भेजे जाने का वर्णन है, तो उन्हें उसी युद्ध में राम के साथ लड़ते हुए दिखाना कहानी के इस हिस्से से अलग है।
यहां एक अंतर समझना जरूरी है। वाल्मीकि रामायण का वर्णन एक प्रमुख प्राचीन पाठ है, लेकिन रामकथा की परंपरा केवल एक ग्रंथ तक सीमित नहीं है। भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण के कई भाषाई, क्षेत्रीय और धार्मिक रूप विकसित हुए हैं। उनमें पात्रों, घटनाओं और प्रसंगों के वर्णन में अंतर मिल सकता है। इसलिए किसी एक फिल्मी दृश्य की तुलना करते समय यह बताना जरूरी है कि उसकी तुलना किस ग्रंथ या परंपरा से की जा रही है।
‘अद्भुत रामायण’ में माता सीता का शक्तिशाली रूप
मेकर्स ने जिस ‘अद्भुत रामायण’ का उल्लेख किया है, वह रामकथा की एक अलग परंपरा से जुड़ा ग्रंथ है। इसमें माता सीता के स्वरूप को केवल वनवास, त्याग और धैर्य तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि उनके भीतर मौजूद दिव्य शक्ति का भी विशेष वर्णन मिलता है।
इस ग्रंथ में सहस्र रावण यानी हजार सिर वाले रावण का प्रसंग आता है। कथा के अनुसार, भगवान राम का सामना इस शक्तिशाली राक्षस से होता है। युद्ध के दौरान जब राम संकट में पड़ते हैं, तब सीता अपने दिव्य और उग्र स्वरूप को प्रकट करती हैं। वह महाकाली के रूप में प्रकट होकर सहस्र रावण का वध करती हैं।
इस प्रसंग में सीता को शक्ति के असाधारण रूप के तौर पर दिखाया गया है। यह वर्णन उस लोकप्रिय छवि से अलग है, जिसमें सीता को मुख्य रूप से वनवास, रावण द्वारा अपहरण, अशोक वाटिका में धैर्य और अग्निपरीक्षा जैसे प्रसंगों के माध्यम से याद किया जाता है।
हालांकि, ‘अद्भुत रामायण’ का सहस्र रावण वाला प्रसंग और फिल्म में दिखाया गया खर-दूषण की सेना से मुकाबला एक ही घटना नहीं हैं। दोनों को अलग-अलग कथात्मक संदर्भों में समझना चाहिए। फिल्म ने योद्धा सीता की अवधारणा से प्रेरणा लेने की बात कही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि फिल्म का हर एक्शन दृश्य उसी ग्रंथ की किसी घटना का सीधा रूपांतरण है।
क्या रामायण की सभी परंपराओं में सीता का एक ही स्वरूप है?
रामायण की कथा सदियों से अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों में सुनाई, पढ़ी और प्रस्तुत की जाती रही है। वाल्मीकि रामायण के अलावा रामचरितमानस, कंब रामायण, कृतिवास रामायण और कई क्षेत्रीय तथा धार्मिक परंपराओं में रामकथा के अलग-अलग रूप मिलते हैं।
इन सभी में मुख्य पात्र और कथा का व्यापक आधार समान हो सकता है, लेकिन कई घटनाओं के विवरण, संवाद, पात्रों की भूमिका और आध्यात्मिक व्याख्या अलग-अलग हो सकती है। कुछ परंपराओं में सीता के धैर्य, मर्यादा और त्याग पर अधिक जोर है, जबकि कुछ अन्य कथाओं में उन्हें देवी शक्ति के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है।
‘अद्भुत रामायण’ में सीता का शक्तिशाली स्वरूप इसी विविधता का उदाहरण है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारतीय परंपरा में सीता का योद्धा रूप कहीं मौजूद ही नहीं है। लेकिन यह भी जरूरी है कि किसी एक ग्रंथ के प्रसंग को दूसरी रामायण की घटना के साथ मिलाकर बिना संदर्भ के प्रस्तुत न किया जाए।
फिल्मकार जब किसी धार्मिक कथा पर फिल्म बनाते हैं, तो उन्हें यह तय करना पड़ता है कि वे किस पाठ, किस परंपरा और किस व्याख्या को आधार बना रहे हैं। दर्शकों की अपेक्षा भी इसी बात पर निर्भर करती है कि फिल्म को मूल ग्रंथ का सीधा रूपांतरण बताया गया है या कई परंपराओं से प्रेरित एक सिनेमाई प्रस्तुति।
साई पल्लवी ने एक्शन सीन के लिए की थी तैयारी
फिल्म में माता सीता की भूमिका साई पल्लवी निभा रही हैं। उनके किरदार को लेकर चर्चा केवल विवाद तक सीमित नहीं है। अभिनेत्री ने भी अपने एक्शन सीक्वेंस की तैयारी के बारे में बताया था।
साई पल्लवी ने कहा था कि वह डांसर हैं और उनके पैरों की ताकत ने एक्शन की तैयारी में मदद की। लेकिन तलवार से लड़ने वाले दृश्यों के लिए उन्हें अलग से अभ्यास करना पड़ा। फिल्म की स्टंट टीम ने उन्हें प्रशिक्षण दिया, ताकि तलवारबाजी को केवल मारधाड़ की तरह नहीं, बल्कि एक नियंत्रित और लयबद्ध अंदाज में दिखाया जा सके।
अभिनेत्री के मुताबिक, टीम चाहती थी कि सीता की तलवारबाजी में एक तरह की सुंदरता और सहजता दिखाई दे। इसलिए एक्शन को नृत्य जैसी गति देने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी कहा था कि दर्शकों ने बचपन से सीता के अलग-अलग चित्रण देखे हैं और इस फिल्म में उनका योद्धा रूप एक अलग अनुभव हो सकता है।
इस तैयारी से यह स्पष्ट होता है कि फिल्म में सीता के एक्शन दृश्यों को केवल अचानक जोड़ा गया छोटा हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि उनके किरदार की प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण पक्ष बनाया गया है। फिर भी दर्शकों को यह चित्रण पसंद आएगा या नहीं, यह उनकी धार्मिक समझ, सांस्कृतिक अनुभव और फिल्म से अपेक्षाओं पर निर्भर करेगा।
दर्शकों की प्रतिक्रिया दो हिस्सों में बंटी
फिल्म रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर इस दृश्य को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। आलोचना करने वाले दर्शकों का कहना है कि रामायण जैसे पूजनीय ग्रंथ पर फिल्म बनाते समय कथा के प्रसंगों को बदलने में सावधानी बरतनी चाहिए। उनका मानना है कि सीता को खर-दूषण के युद्ध में शामिल दिखाना उस प्रसंग की पारंपरिक समझ से मेल नहीं खाता।
कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि क्या फिल्म में एक्शन और दृश्य प्रभाव बढ़ाने के लिए धार्मिक कथा में बदलाव किया गया है। उनका तर्क है कि दर्शक रामायण देखने आते हैं, इसलिए उन्हें कथा के मूल प्रसंगों के प्रति ईमानदारी की उम्मीद रहती है।
दूसरी ओर, फिल्म के समर्थकों का कहना है कि सीता को शक्तिशाली दिखाने में अपने आप में कुछ गलत नहीं है। वे ‘अद्भुत रामायण’ का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि सीता को शक्ति का स्वरूप मानने की परंपरा भी भारतीय धार्मिक साहित्य में मौजूद है।
कुछ दर्शकों के लिए यह चित्रण महिलाओं की शक्ति और आत्मनिर्भरता को सामने लाने का प्रयास है। उनके मुताबिक, सीता के व्यक्तित्व को केवल एक ही छवि में सीमित करना उचित नहीं होगा।
इस बहस में यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि सोशल मीडिया पर वायरल टिप्पणियां सभी दर्शकों की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। किसी दृश्य को लेकर कुछ पोस्ट या वीडियो वायरल होने का अर्थ यह नहीं है कि पूरी फिल्म देखने वाले सभी लोगों की प्रतिक्रिया एक जैसी है।
धार्मिक कथा पर फिल्म बनाते समय रचनात्मक स्वतंत्रता की सीमा क्या हो?
यह विवाद एक बड़े सवाल को सामने लाता है—क्या फिल्मकारों को रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों में बदलाव करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए?
फिल्म एक दृश्य माध्यम है। इसमें कहानी को सीमित समय में दिखाना, पात्रों के भाव समझाना और दर्शकों को दृश्य रूप से जोड़ना जरूरी होता है। इस प्रक्रिया में निर्देशक कई बार अलग-अलग ग्रंथों, लोककथाओं और क्षेत्रीय परंपराओं से सामग्री लेते हैं। लेकिन जब विषय धार्मिक आस्था से जुड़ा हो, तब दर्शक फिल्म को केवल मनोरंजन नहीं मानते। उनके लिए पात्रों और घटनाओं का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी होता है।
इसी वजह से एक छोटा-सा बदलाव भी बड़ी चर्चा का कारण बन सकता है। किसी पात्र का पहनावा, संवाद, व्यवहार या युद्ध में उसकी भूमिका दर्शकों की पारंपरिक समझ से अलग हो, तो सवाल उठ सकते हैं।
फिल्मकारों के लिए सबसे अच्छा तरीका यह हो सकता है कि वे स्पष्ट करें कि फिल्म किस ग्रंथ या परंपरा से प्रेरित है और किन हिस्सों में सिनेमाई कल्पना का इस्तेमाल किया गया है। इससे दर्शकों को यह समझने में मदद मिलती है कि फिल्म किसी एक पाठ का शब्दशः रूपांतरण नहीं है, बल्कि कई स्रोतों से प्रेरित प्रस्तुति है।
इस मामले में नितेश तिवारी ने ‘अद्भुत रामायण’ का हवाला देकर अपनी रचनात्मक सोच बताई है। लेकिन दर्शकों की आलोचना भी इस बात की याद दिलाती है कि धार्मिक कथाओं के साथ काम करते समय संवेदनशीलता और संदर्भ दोनों महत्वपूर्ण हैं।
‘रामायण’ फिल्म में कौन-कौन से कलाकार हैं?
नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी ‘रामायण: राइज ऑफ अ लेजेंड’ में रणबीर कपूर भगवान राम की भूमिका निभा रहे हैं। साई पल्लवी माता सीता के किरदार में हैं, जबकि यश रावण की भूमिका में नजर आ रहे हैं। रवि दुबे लक्ष्मण और सनी देओल हनुमान का किरदार निभा रहे हैं।
फिल्म को दो भागों में बनाने की योजना है। इसका पहला भाग 5 नवंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुआ है। फिल्म के निर्माण को बड़े स्तर पर किया गया है और इसमें भारतीय कलाकारों के साथ अंतरराष्ट्रीय तकनीकी टीम भी जुड़ी है। संगीत के लिए ए.आर. रहमान और हंस जिमर का नाम भी परियोजना से जुड़ा है।
फिल्म को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी इसकी भव्यता, कलाकारों और रामायण की कहानी को नए अंदाज में देखने की वजह से रही है। लेकिन रिलीज के बाद सीता के एक्शन सीन ने चर्चा को एक नए मोड़ पर पहुंचा दिया है।
विवाद का असर फिल्म की चर्चा पर कितना पड़ेगा?
किसी बड़ी फिल्म को लेकर विवाद होने पर उसकी चर्चा सोशल मीडिया और मनोरंजन जगत में बढ़ सकती है। लेकिन केवल विवाद के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि फिल्म को नुकसान होगा या उसे दर्शकों का समर्थन नहीं मिलेगा। इसका वास्तविक असर दर्शकों की प्रतिक्रिया, टिकट बिक्री और आने वाले दिनों के प्रदर्शन से ही समझा जा सकेगा।
‘रामायण’ के मामले में सीता के एक्शन सीन पर बहस फिल्म की कहानी और उसके स्रोतों को लेकर है। एक तरफ दर्शक वाल्मीकि रामायण के खर-दूषण प्रसंग का हवाला दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ मेकर्स ‘अद्भुत रामायण’ में मौजूद सीता के शक्तिशाली स्वरूप को अपनी प्रेरणा बता रहे हैं।
इसलिए इस विवाद को केवल सही या गलत के सवाल तक सीमित करने के बजाय अलग-अलग रामायण परंपराओं और फिल्म की रचनात्मक व्याख्या के संदर्भ में देखना जरूरी है।


