दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र प्रदर्शन के बीच नारों, पोस्टरों और भीड़ से अलग एक तस्वीर ने लोगों का ध्यान खींचा है। प्रदर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में जुटे युवाओं के बीच कुछ छात्र और स्वयंसेवक हाथों में झाड़ू, कूड़े के बैग और दस्ताने लेकर सड़कों की सफाई करते दिखाई दिए। उन्होंने सड़क और प्रदर्शन स्थल पर पड़े पानी की बोतलें, खाने के पैकेट, कागज और दूसरे कचरे को इकट्ठा किया और उसे कूड़ेदानों व कचरे के बैग में डाला।
प्रदर्शन के बाद सफाई करते छात्रों के वीडियो सोशल मीडिया पर भी सामने आए हैं। इनमें कुछ लोग झाड़ू लगाते हुए तो कुछ जमीन पर पड़ा कचरा उठाकर बैग में भरते दिखाई देते हैं। प्रदर्शन के दौरान हजारों लोगों की मौजूदगी और बाहर से पहुंच रहे खाने-पानी के कारण बड़ी मात्रा में कचरा जमा हो रहा था। ऐसे में छात्रों और स्वयंसेवकों ने सफाई को भी प्रदर्शन की जिम्मेदारी का हिस्सा बनाया।
यह पहल इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आम तौर पर बड़े प्रदर्शनों के बाद सड़कों पर प्लास्टिक की बोतलें, खाने के पैकेट, पोस्टर, कागज और दूसरी चीजें बिखरी रह जाती हैं। इसकी सफाई का पूरा बोझ अक्सर नगर निकाय के सफाई कर्मचारियों पर आ जाता है। जंतर-मंतर पर मौजूद कुछ प्रदर्शनकारियों ने इसके उलट खुद झाड़ू और कचरे के बैग उठाकर सफाई करने का फैसला किया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक 20 जुलाई को हुए ‘चलो संसद’ मार्च और उसके बाद की घटनाओं के अगले दिन भी कई छात्र स्वयंसेवक जंतर-मंतर पर सफाई करते नजर आए। वायरल वीडियो में गीली जमीन, टेंट और अस्थायी व्यवस्था के आसपास फैला कचरा साफ करते प्रदर्शनकारी दिखाई दिए।
प्रदर्शन स्थल पर सफाई केवल एक दिन की गतिविधि तक सीमित नहीं रही। जैसे-जैसे आंदोलन स्थल पर खाने और पानी की सप्लाई बढ़ी, वैसे-वैसे waste management की जरूरत भी बढ़ती गई।
देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रदर्शनकारियों के लिए खाने के पैकेट, पानी और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाई जा रही थीं। इतनी बड़ी मात्रा में पैक्ड फूड आने के कारण खाली डिब्बे, प्लास्टिक की बोतलें, पेपर बैग और दूसरे प्रकार का कचरा भी तेजी से जमा होने लगा।
इसके बाद प्रदर्शन से जुड़े लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए समर्थकों से जरूरत से ज्यादा खाना भेजने के बजाय सफाई से जुड़ी सामग्री भेजने की अपील की। रिपोर्ट के मुताबिक लोगों से बड़े झाड़ू, garbage bags और dustbins जैसी चीजें उपलब्ध कराने की मांग की गई।
इस अपील का असर भी दिखाई दिया।
कुछ लोग प्रदर्शन स्थल पर खाने-पीने की सामग्री लेकर आने के बजाय झाड़ू, दस्ताने और कचरे के बैग लेकर पहुंचने लगे। दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक पूर्व छात्रा ने द ट्रिब्यून को बताया कि पहली बार वह खाने और जूस जैसी चीजें लेकर जंतर-मंतर पहुंची थीं, लेकिन अगली बार सफाई की जरूरत से जुड़ी पोस्ट देखने के बाद वह अपने दोस्तों के साथ garbage bags, gloves और brooms लेकर आईं।
यह छोटा बदलाव प्रदर्शन स्थल की व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।
प्रदर्शन में शामिल लोग केवल अपनी मांगों को लेकर नारे लगाने या मार्च करने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उस सार्वजनिक स्थान की सफाई में भी योगदान देने लगे जिसका वे इस्तेमाल कर रहे थे।
कई स्वयंसेवकों ने सड़कों पर पड़ा कचरा इकट्ठा किया। कुछ लोगों ने झाड़ू लगाई। दूसरे स्वयंसेवक कचरे को अलग-अलग बैग में भरते नजर आए।
द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक जंतर-मंतर पर सफाई के लिए दर्जनों छात्र आगे आए। कुछ volunteers neon jackets, masks और heavy gloves पहनकर सफाई कर रहे थे। छात्रों ने प्रदर्शन स्थल के आसपास dustbins लगाने और लोगों को उनमें कचरा डालने के लिए प्रेरित करने की कोशिश भी की।
यानी उद्देश्य केवल जमीन पर पड़ा कचरा उठाना नहीं था।
कोशिश यह भी थी कि आगे नया कचरा सड़क पर कम फेंका जाए।
किसी बड़े सार्वजनिक आयोजन में यही तरीका ज्यादा प्रभावी माना जा सकता है। अगर केवल कार्यक्रम खत्म होने के बाद सफाई की जाए तो तब तक बड़ी मात्रा में कचरा फैल चुका होता है। इसके बजाय शुरुआत से पर्याप्त dustbins रखे जाएं और लोगों को उनका इस्तेमाल करने के लिए कहा जाए तो सफाई का काम काफी आसान हो सकता है।
जंतर-मंतर पर छात्रों ने इसी दिशा में काम करने की कोशिश की।
प्रदर्शन स्थल पर कचरे की समस्या की एक बड़ी वजह खाने की भारी सप्लाई भी थी।
सोशल मीडिया पर प्रदर्शन के समर्थन में कई लोगों ने ऑनलाइन food orders भेजे। बड़ी संख्या में food packets पहुंचने के बाद कुछ मौकों पर जरूरत से ज्यादा खाना जमा हो गया।
ऐसी स्थिति में एक दूसरी पहल भी सामने आई।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शनकारियों ने बचा हुआ untouched food बर्बाद करने के बजाय पास के अस्पताल के बाहर मौजूद मरीजों के परिजनों और दूसरे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया। इसके बाद प्रदर्शन स्थल की सफाई करते लोगों के वीडियो भी सामने आए।
इस तरह प्रदर्शन स्थल पर दो अलग समस्याओं को एक साथ संभालने की कोशिश की गई।
पहली थी खाने की बर्बादी।
दूसरी थी कचरा।
अगर जरूरत से ज्यादा खाने के पैकेट वहीं पड़े रहते तो भोजन बर्बाद होने के साथ उनसे और ज्यादा waste पैदा होता। इसके बजाय उपयोग योग्य भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचाने और खाली पैकेजिंग को साफ करने की कोशिश की गई।
सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों और वीडियो पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई यूजर्स ने इसे जिम्मेदार नागरिक व्यवहार बताया और छात्रों की सराहना की। कुछ लोगों ने इसे इस बात का उदाहरण माना कि अपनी मांगों के लिए सार्वजनिक जगह पर इकट्ठा होने के साथ उस जगह की जिम्मेदारी भी ली जानी चाहिए।
हालांकि किसी वायरल वीडियो के आधार पर पूरे प्रदर्शन स्थल की सफाई व्यवस्था को आदर्श मान लेना भी सही नहीं होगा।
ग्राउंड रिपोर्ट्स में जंतर-मंतर के आसपास कचरे के ढेर और खाने के waste की समस्या का भी जिक्र किया गया है। यानी एक तरफ बड़ी मात्रा में कचरा जमा हो रहा था और दूसरी तरफ volunteers उसे संभालने की कोशिश कर रहे थे।
यही इस पूरी घटना को ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है।
अगर जगह पहले से पूरी तरह साफ होती तो volunteers को झाड़ू लेकर उतरने की जरूरत ही नहीं पड़ती। चुनौती इसलिए पैदा हुई क्योंकि हजारों लोगों की मौजूदगी और लगातार आ रही supplies ने sanitation system पर दबाव बढ़ा दिया।
लेकिन उस समस्या को देखकर स्वयंसेवकों का आगे आना नागरिक भागीदारी का उदाहरण बना।
भारत में जंतर-मंतर लंबे समय से विरोध प्रदर्शन और सार्वजनिक आंदोलनों का प्रमुख स्थान रहा है। अलग-अलग राज्यों और संगठनों के लोग अपनी मांगों को लेकर यहां पहुंचते हैं।
जब बड़ी संख्या में लोग एक ही जगह इकट्ठा होते हैं तो crowd management के साथ sanitation management भी जरूरी हो जाता है।
पानी की व्यवस्था करनी होती है।
खाने की व्यवस्था करनी होती है।
Toilets की जरूरत होती है।
Medical support की जरूरत पड़ सकती है।
और इन सबके साथ कचरा इकट्ठा करने तथा उसे निर्धारित स्थान तक पहुंचाने की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।
अगर हजारों लोग एक दिन में एक-एक पानी की बोतल इस्तेमाल करें तो सिर्फ बोतलों की संख्या ही हजारों में पहुंच सकती है। इसके अलावा food packets, disposable plates, cups, tissues और दूसरे सामान अलग होते हैं।
यानी किसी बड़े protest या public gathering का environmental footprint बहुत तेजी से बढ़ सकता है।
यही कारण है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा खुद सफाई करना केवल प्रतीकात्मक तस्वीर नहीं बल्कि practical जरूरत भी थी।
इंडिया टुडे की ग्राउंड रिपोर्ट में बताया गया कि प्रदर्शन स्थल के आसपास food waste, plastic bottles, pizza boxes और paper bags जैसी चीजें दिखाई दे रही थीं। उसी दौरान volunteers gloves और garbage bags के साथ कचरा उठाने में लगे थे।
इसमें एक दिलचस्प बात यह भी रही कि sanitation volunteers जरूरी नहीं कि किसी औपचारिक सफाई टीम का हिस्सा हों।
कई लोग प्रदर्शन में शामिल होने आए और जरूरत देखकर सफाई के काम में जुट गए।
किसी ने garbage bag पकड़ा।
किसी ने झाड़ू उठा ली।
किसी ने लोगों से सड़क पर कचरा न फेंकने को कहा।
किसी ने dustbin की व्यवस्था में मदद की।
ऐसे छोटे-छोटे काम मिलकर बड़े आयोजन की व्यवस्था संभालने में मदद करते हैं।
द प्रिंट की रिपोर्ट में एक मेडिकल छात्र के हवाले से बताया गया कि प्रदर्शन स्थल पर dustbins लगाए जा रहे थे और लोगों को उनका इस्तेमाल करने के लिए कहा जा रहा था, ताकि आंदोलन अपने पीछे कचरे का ढेर छोड़ने के बजाय एक साफ संदेश छोड़े।
यही संदेश इस घटना के वायरल होने की बड़ी वजह बना।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन नागरिकों को अपनी मांग और असहमति सामने रखने का माध्यम देता है। लेकिन सार्वजनिक स्थान भी सभी नागरिकों की साझा संपत्ति हैं।
ऐसे में अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ सार्वजनिक जगहों के प्रति जिम्मेदारी का सवाल भी जुड़ता है।
सड़क पर प्रदर्शन करना और बाद में उसी सड़क को साफ करना इन दोनों पहलुओं को एक साथ दिखाता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर बड़े प्रदर्शन में sanitation की पूरी जिम्मेदारी केवल प्रदर्शनकारियों की ही होनी चाहिए। नगर निकाय, आयोजन से जुड़े लोग और प्रशासन सभी की अपनी भूमिका होती है।
लेकिन participants अपने स्तर पर littering कम करें तो व्यवस्था पर दबाव काफी कम किया जा सकता है।
इस घटना से दूसरे सार्वजनिक आयोजनों के लिए भी कुछ सीख मिलती है।
राजनीतिक रैली हो, धार्मिक कार्यक्रम, कॉलेज फेस्टिवल, खेल आयोजन या बड़ा concert—जहां हजारों लोग इकट्ठा होंगे वहां कचरा भी पैदा होगा।
अक्सर आयोजनों के बाद सोशल मीडिया पर मैदानों और सड़कों पर फैले कचरे की तस्वीरें सामने आती हैं।
ऐसी स्थिति को रोकने के लिए waste management को आयोजन के बाद का काम मानने के बजाय planning का हिस्सा बनाना जरूरी है।
जंतर-मंतर पर students और volunteers द्वारा dustbins लगाने की कोशिश इसी approach का उदाहरण है।
अगर आयोजन स्थल पर हर कुछ दूरी पर कूड़ेदान उपलब्ध हों, volunteers लोगों को सही जगह कचरा डालने के लिए कहें और garbage bags समय-समय पर हटाए जाएं तो सड़क पर फैलने वाले waste को काफी कम किया जा सकता है।
इसके अलावा wet और dry waste को अलग करने की व्यवस्था हो तो recycling भी आसान हो सकती है।
Plastic bottles को बाकी food waste के साथ मिलाने के बजाय अलग collect किया जा सकता है।
Cardboard boxes और paper packaging भी recyclable हो सकते हैं।
हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों से यह स्पष्ट नहीं है कि जंतर-मंतर पर बड़े स्तर पर formal waste segregation की पूरी व्यवस्था लागू थी या नहीं। इसलिए इसे एक पूरी recycling initiative के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
जो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है वह है volunteers का सफाई अभियान।
छात्र झाड़ू लेकर निकले।
उन्होंने कचरा इकट्ठा किया।
Garbage bags इस्तेमाल किए।
Dustbins लगाए गए।
और लोगों को सार्वजनिक जगह साफ रखने का संदेश दिया गया।
इस घटना का एक दूसरा पहलू युवाओं की self-organisation क्षमता है।
बड़े प्रदर्शन में हर छोटी चीज के लिए किसी केंद्रीय आदेश का इंतजार करना संभव नहीं होता।
कहीं पानी खत्म होता है, कहीं medical help चाहिए, कहीं भीड़ संभालनी होती है और कहीं कचरा जमा हो जाता है।
ऐसी स्थिति में volunteers अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हैं।
हाल की रिपोर्टों में जंतर-मंतर पर sanitation के अलावा food distribution, medical assistance और crowd management में भी volunteers की भूमिका का जिक्र किया गया है।
यानी प्रदर्शन का visible हिस्सा मंच और नारे हो सकते हैं, लेकिन उसके पीछे बहुत बड़ा logistical network काम करता है।
अगर sanitation व्यवस्था न हो तो कुछ ही घंटों में किसी बड़े protest site पर रहना मुश्किल हो सकता है।
गर्मी और बारिश के मौसम में food waste ज्यादा तेजी से खराब हो सकता है और दुर्गंध तथा hygiene की समस्या बढ़ सकती है।
जुलाई में दिल्ली का मौसम इस चुनौती को और बढ़ाता है।
द प्रिंट की रिपोर्ट में भी प्रदर्शन स्थल के आसपास जमा waste से बढ़ती दुर्गंध का उल्लेख किया गया। इसी कारण सफाई का काम तत्काल जरूरत बन गया था।
सफाई करते छात्रों की तस्वीरों में एक सामाजिक संदेश भी दिखाई देता है।
भारत में अक्सर सार्वजनिक सफाई को केवल sanitation workers का काम मान लिया जाता है। कई लोग अपने घर को साफ रखते हैं लेकिन सार्वजनिक सड़क पर wrapper या bottle फेंकने को उतनी गंभीरता से नहीं लेते।
जब कॉलेज के छात्र और युवा खुद झाड़ू उठाकर सड़क साफ करते दिखाई देते हैं तो यह सोच को चुनौती देता है।
सार्वजनिक जगह साफ रखना किसी एक पेशे या वर्ग की जिम्मेदारी नहीं बल्कि सभी लोगों के व्यवहार से जुड़ा विषय है।
अगर कोई व्यक्ति कचरा पैदा करता है तो कम-से-कम उसे निर्धारित dustbin तक पहुंचाना उसकी बुनियादी नागरिक जिम्मेदारी हो सकती है।
इसमें कोई बड़ा अभियान जरूरी नहीं।
पानी की खाली बोतल सड़क पर न छोड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
Food wrapper को जेब या bag में रखकर बाद में dustbin में डालना भी सफाई का हिस्सा है।
Public gathering में reusable water bottles और कम packaging वाले सामान का इस्तेमाल waste कम कर सकता है।
इसी तरह organizers जरूरत से ज्यादा food order होने से रोकें तो food waste और packaging waste दोनों कम किए जा सकते हैं।
जंतर-मंतर की घटना में excess food की समस्या सामने आने के बाद लोगों से और खाना न भेजने की अपील करना इसी दिशा में practical कदम था।
यह भी महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया ने इस पूरे सिस्टम में दो भूमिकाएं निभाईं।
एक तरफ सफाई करते छात्रों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए।
दूसरी तरफ उसी सोशल मीडिया का इस्तेमाल जरूरत की चीजों की जानकारी देने के लिए किया गया।
अगर खाने की जरूरत कम थी लेकिन garbage bags और brooms की जरूरत ज्यादा थी तो supporters को उसी हिसाब से सामान भेजने को कहा गया।
इससे donation और supply ज्यादा targeted हो सकती है।
बड़े जन आंदोलनों में यह model आगे भी उपयोगी हो सकता है।
लोग मदद करना चाहते हैं, लेकिन अगर उन्हें वास्तविक जरूरत की जानकारी न हो तो एक ही चीज बहुत ज्यादा मात्रा में पहुंच सकती है जबकि दूसरी जरूरी चीज की कमी बनी रहती है।
जंतर-मंतर पर यही स्थिति food supplies के साथ देखने को मिली।
इसके बाद जरूरतों की सूची साझा करना logistics को बेहतर करने की कोशिश थी।
इस पूरी घटना को केवल “वायरल वीडियो” के रूप में देखना इसकी बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा।
यह public protest के दौरान पैदा होने वाली practical challenges की कहानी भी है।
हजारों लोगों को एक जगह लाना आसान नहीं होता।
उनके लिए पानी, खाना, medical assistance और sanitation की व्यवस्था करनी पड़ती है।
और जब व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है तो volunteers की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्रदर्शन खत्म होने या दिन की गतिविधियां कम होने के बाद छात्रों का सड़क पर वापस आकर सफाई करना इस जिम्मेदारी का दिखाई देने वाला हिस्सा बना।
सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे अलग-अलग नजरिए से देखा, लेकिन सफाई के मूल संदेश पर शायद बहुत कम विवाद हो सकता है—सार्वजनिक जगह इस्तेमाल करने के बाद उसे साफ रखना बेहतर नागरिक व्यवहार है।
विरोध प्रदर्शन अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने के लिए होता है।
लेकिन अगर वही प्रदर्शन आसपास रहने वाले लोगों के लिए कचरा और गंदगी छोड़ जाए तो उसका दूसरा प्रभाव भी पैदा होता है।
इसलिए protest culture में cleanliness और waste management को शामिल करना एक सकारात्मक बदलाव माना जा सकता है।
जंतर-मंतर पर छात्रों और स्वयंसेवकों ने कम-से-कम इस दिशा में एक उदाहरण पेश किया है।
उन्होंने केवल झाड़ू नहीं उठाई, बल्कि dustbins लगाने, garbage bags जुटाने, जरूरत से ज्यादा भोजन को बर्बाद होने से बचाने और सफाई सामग्री की जरूरत सार्वजनिक रूप से बताने जैसी कोशिशें भी कीं।
आने वाले समय में यह मॉडल दूसरे बड़े public gatherings के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
आयोजन से पहले waste management plan बने।
पर्याप्त dustbins रखे जाएं।
Volunteers की sanitation team हो।
Plastic और food waste अलग-अलग इकट्ठा किया जाए।
बचा हुआ सुरक्षित भोजन जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था हो।
और कार्यक्रम खत्म होने के बाद participants भी सफाई में योगदान दें।
ऐसा होने पर बड़े कार्यक्रमों का शहर पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है।
जंतर-मंतर पर सामने आई तस्वीरों का सबसे सीधा संदेश भी यही है—अपनी आवाज उठाना जरूरी हो सकता है, लेकिन जिस सड़क पर आवाज उठाई गई, उसकी जिम्मेदारी लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
प्रदर्शन के बाद हाथों में झाड़ू लिए युवाओं की तस्वीर इसी वजह से लोगों का ध्यान खींच रही है।
नारे खत्म होने के बाद भी उनका काम खत्म नहीं हुआ।
कुछ छात्र सड़क पर रुके।
झाड़ू उठाई।
बोतलें और wrappers इकट्ठे किए।
कचरे को bags और dustbins में डाला।
और फिर उस जगह को साफ करने की कोशिश की जहां कुछ घंटे पहले हजारों लोग अपनी मांगों को लेकर खड़े थे।
यह घटना इस बात का उदाहरण है कि किसी आंदोलन का संदेश केवल मंच से बोले गए शब्दों से नहीं बनता। कई बार आंदोलन के बाद छोड़ी गई सड़क भी उसके बारे में बहुत कुछ बताती है।
और अगर वह सड़क पहले से ज्यादा व्यवस्थित और साफ छोड़ने की कोशिश की जाए, तो वह अपने आप में एक अलग संदेश बन सकती है।
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