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दुनिया में तेल संकट: क्रूड 118 डॉलर पहुंचा, भारत ने दी राहत

दुनिया इस समय एक नए ऊर्जा संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेजी ने कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। वैश्विक बाजार में अस्थिरता और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक जारी रहती है तो इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

हाल ही में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो कई दशकों के बाद दर्ज किया गया बड़ा उछाल माना जा रहा है। हालांकि इसके बाद कीमतों में कुछ गिरावट आई और यह लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई। इसके बावजूद बाजार में अस्थिरता बनी हुई है और विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कीमतें फिर से ऊपर जा सकती हैं।

ऊर्जा बाजार में इस तरह की स्थिति तब बनती है जब आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव ने तेल आपूर्ति की संभावनाओं को प्रभावित किया है। कई निवेशक और व्यापारी आशंका जता रहे हैं कि अगर संघर्ष और बढ़ा तो तेल उत्पादन और परिवहन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादन क्षेत्रों में से एक है। यहां से दुनिया के कई देशों को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल निर्यात किया जाता है। यदि इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो वैश्विक बाजार में आपूर्ति कम हो सकती है और कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ता है जो तेल आयात पर निर्भर हैं। भारत भी उन देशों में शामिल है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बदलाव का असर घरेलू ईंधन कीमतों पर भी पड़ सकता है।

हालांकि भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी की संभावना नहीं है। सरकार का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर नहीं जाती, तब तक घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में बड़ी वृद्धि नहीं होगी।

सरकार का यह भी कहना है कि देश में ईंधन का पर्याप्त भंडार मौजूद है। इसलिए अचानक किसी तरह की घबराहट या खरीदारी की जरूरत नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में अफवाहों के कारण कई बार अनावश्यक दबाव बन जाता है।

इस बीच एशियाई शेयर बाजारों पर भी तेल संकट का असर देखने को मिला। कई प्रमुख बाजारों में गिरावट दर्ज की गई और निवेशकों ने जोखिम कम करने के लिए सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख किया। ऊर्जा कीमतों में तेजी का असर उद्योगों की लागत पर भी पड़ता है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा संकट का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। बिजली उत्पादन, परिवहन, खाद्य आपूर्ति और औद्योगिक उत्पादन जैसे कई क्षेत्रों पर इसका प्रभाव पड़ता है।

यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो कई देशों में महंगाई बढ़ सकती है। इसका सीधा असर आम लोगों के दैनिक खर्च पर पड़ता है।

भारत में ऊर्जा क्षेत्र को स्थिर बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काम किया है। नवीकरणीय ऊर्जा, प्राकृतिक गैस और वैकल्पिक ईंधनों पर जोर दिया जा रहा है ताकि आयातित तेल पर निर्भरता कम की जा सके।

इसके अलावा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी तैयार किए गए हैं, जिनका उपयोग आपातकालीन परिस्थितियों में किया जा सकता है। इससे देश को अचानक होने वाले आपूर्ति संकट से निपटने में मदद मिलती है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगी। इसलिए कई देश अब नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसी तकनीकों पर दुनिया भर में निवेश बढ़ रहा है। इनका उद्देश्य पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना है।

हालांकि फिलहाल कच्चा तेल अभी भी वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। इसलिए इसके बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर लंबे समय तक महसूस किया जाता है।

फिलहाल दुनिया की नजर मध्य-पूर्व की स्थिति पर बनी हुई है। यदि तनाव कम होता है तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन यदि संघर्ष बढ़ता है तो तेल की कीमतों में फिर से तेज उछाल देखने को मिल सकता है।

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