मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष का असर अब आम लोगों की जिंदगी पर साफ दिखाई देने लगा है। ईरान-इजरायल तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन में आई बाधाओं के कारण दवाइयों की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले 15 से 20 दिनों के भीतर दवाओं की कीमतों में 25 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
यह संकट केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत जैसे देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था और आम जनता की जेब पर पड़ रहा है। खासकर वे मरीज जो रोजाना दवाओं पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक बनती जा रही है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल यानी API (Active Pharmaceutical Ingredients) की कीमतों में भारी उछाल आया है। कुछ मामलों में यह 150% से लेकर 166% तक महंगा हो चुका है। इससे दवा कंपनियों की लागत बढ़ गई है, जिसका असर अब बाजार में दिखने लगा है।
भारत में फार्मा सेक्टर का एक बड़ा हिस्सा चीन से आने वाले कच्चे माल पर निर्भर करता है। युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण शिपिंग रूट प्रभावित हुए हैं, जिससे माल की आपूर्ति में देरी हो रही है। जहां पहले माल 30-40 दिनों में पहुंच जाता था, वहीं अब इसमें 80-90 दिन तक का समय लग रहा है।
इस देरी के कारण शिपिंग लागत भी तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले जहां प्रति किलो शिपिंग लागत 15 रुपये थी, अब यह बढ़कर 40 रुपये तक पहुंच गई है। यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर दवाओं की कीमतों को प्रभावित कर रही है।
सबसे ज्यादा असर उन मरीजों पर पड़ने वाला है, जो बीपी, डायबिटीज, अस्थमा जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं और रोजाना दवाएं लेते हैं। इन दवाओं की कीमत बढ़ने से उनका मासिक खर्च काफी बढ़ सकता है।
मध्य प्रदेश की करीब 200 फार्मा कंपनियां इस संकट से प्रभावित हो रही हैं। छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उनके पास लागत बढ़ने के बावजूद कीमत नियंत्रित रखने की सीमित क्षमता होती है।
दवा बाजार के जानकारों का कहना है कि सबसे पहले असर जेनेरिक दवाओं पर देखने को मिलेगा। अभी तक जिन दवाओं पर 10-20% तक छूट मिलती थी, वे अब MRP पर बिकने लगी हैं। आने वाले दिनों में ब्रांडेड दवाएं और सर्जिकल सामान भी महंगे हो सकते हैं।
इस बीच, पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और दर्द निवारक दवाओं के कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया है। उदाहरण के तौर पर, पैरासिटामोल का कच्चा माल 155% तक महंगा हो चुका है।
यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर केवल दवाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे हेल्थकेयर सेक्टर पर पड़ेगा। अस्पतालों की लागत बढ़ेगी और इलाज महंगा हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस स्थिति पर नजर रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने होंगे। साथ ही, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत है ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके।
यह संकट हमें यह भी सिखाता है कि वैश्विक घटनाओं का असर किस तरह आम आदमी की जिंदगी पर पड़ता है। एक तरफ जहां युद्ध राजनीतिक मुद्दा होता है, वहीं दूसरी तरफ इसका असर सीधे जनता की जेब पर पड़ता है।
कुल मिलाकर, दवाइयों की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी एक गंभीर चिंता का विषय है। अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में स्वास्थ्य सेवाएं आम लोगों की पहुंच से दूर हो सकती हैं।













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