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एथेनॉल से गन्ना हटाएगी सरकार? चीनी की कीमतें घटाने की तैयारी, जानें पूरा मामला

भारत में चीनी की बढ़ती कीमतों और आने वाले सीजन में उत्पादन को लेकर सरकार अब एथेनॉल नीति में बदलाव पर विचार कर रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले नए शुगर सीजन में गन्ने के इस्तेमाल को एथेनॉल उत्पादन के लिए सीमित करने पर विचार कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है।

मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने के लिए गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा है। अब यदि चीनी की उपलब्धता कम होती है और कीमतें लगातार ऊपर बनी रहती हैं, तो सरकार के सामने खाद्य जरूरत और ईंधन नीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती पैदा हो गई है।

ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार अगले सीजन में चीनी उत्पादन को प्राथमिकता देने के लिए गन्ने के रस या B-heavy molasses से एथेनॉल बनाने की अनुमति को सीमित करने पर विचार कर सकती है। इसके बजाय एथेनॉल उत्पादन के लिए C-heavy molasses को ज्यादा प्राथमिकता दी जा सकती है। C-heavy molasses वह अवशेष है जो चीनी की अधिक मात्रा निकालने के बाद बचता है। इससे गन्ने से पहले चीनी उत्पादन और उसके बाद उपलब्ध अवशेष से एथेनॉल बनाने का रास्ता मजबूत होगा।

इस संभावित बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता को लेकर चिंता है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा साल में करीब 30 लाख मीट्रिक टन चीनी को एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया गया। यदि आने वाले सीजन में गन्ने की उपलब्धता और चीनी उत्पादन पर दबाव रहता है, तो सरकार इस डायवर्जन को कम करके ज्यादा चीनी बाजार में लाने की कोशिश कर सकती है।

चीनी की कीमतों पर मौसम का असर भी महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में बारिश की स्थिति को लेकर चिंता जताई गई है। इन राज्यों में गन्ने की पैदावार प्रभावित होने पर देश के कुल चीनी उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार पहले से ही बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के विकल्प तलाश रही है।

हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि सरकार ने अभी गन्ने से एथेनॉल उत्पादन पर पूर्ण रोक लगाने का अंतिम फैसला नहीं किया है। मौजूदा जानकारी के मुताबिक यह एक संभावित नीति बदलाव है और नए शुगर मार्केटिंग ईयर से पहले एथेनॉल आवंटन तथा नियमों को लेकर अंतिम फैसला लिया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार नए सीजन के लिए निर्णय नवंबर से पहले आने की संभावना है।

चीनी की कीमतों को नियंत्रित करना सरकार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीनी भारतीय घरों में इस्तेमाल होने वाली रोजमर्रा की प्रमुख वस्तु है। इसके अलावा मिठाई, बिस्किट, पेय पदार्थ, डेयरी और अन्य खाद्य उद्योगों में भी चीनी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती है। चीनी महंगी होने पर केवल घरेलू उपभोक्ताओं का बजट प्रभावित नहीं होता, बल्कि कई खाद्य उत्पादों की उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है।

इसी वजह से सरकार चीनी के उत्पादन, स्टॉक, घरेलू बिक्री और निर्यात पर लगातार नजर रखती है। केंद्र सरकार ने हाल ही में चीनी कारोबारियों के लिए स्टॉक होल्डिंग लिमिट भी लागू की है। यह व्यवस्था 1 अगस्त 2026 से लागू हुई है और 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहने वाली है। इसका उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी पर नियंत्रण रखते हुए घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना है।

सरकार के लिए चुनौती यह है कि चीनी की कीमतें नियंत्रित करने के साथ-साथ किसानों और चीनी मिलों के हितों का भी ध्यान रखना होगा। गन्ना किसानों को मिलने वाली कीमत सरकार द्वारा तय Fair and Remunerative Price यानी FRP से जुड़ी होती है। 2026-27 सीजन के लिए केंद्र ने गन्ने की FRP ₹365 प्रति क्विंटल तय की है, जो 10.25% की बेसिक रिकवरी रेट के लिए है। सरकार के मुताबिक इस फैसले से करीब 5 करोड़ गन्ना किसानों और उनके आश्रितों तथा चीनी मिलों से जुड़े करीब 5 लाख कर्मचारियों को लाभ होगा।

गन्ने की FRP बढ़ने का मतलब यह है कि चीनी मिलों के लिए गन्ने की खरीद लागत भी महत्वपूर्ण बनी रहती है। दूसरी तरफ यदि चीनी की बाजार कीमत बढ़ती है तो मिलों को अधिक राजस्व मिल सकता है। ऐसे में सरकार को चीनी और एथेनॉल के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा जिससे किसानों को उचित कीमत मिले, मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत रहे और आम उपभोक्ता को चीनी बहुत महंगी न खरीदनी पड़े।

एथेनॉल नीति में संभावित बदलाव का एक दूसरा पहलू पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य है। भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति के तहत एथेनॉल उत्पादन क्षमता और उपलब्धता बढ़ाई है। गन्ने के अलावा मक्का और चावल जैसे फीडस्टॉक भी एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किए जाते हैं। सरकार अब चीनी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए एथेनॉल उत्पादन में इन वैकल्पिक स्रोतों की भूमिका बढ़ा सकती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति खत्म हो रही है। बल्कि संभावित बदलाव का उद्देश्य एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का मिश्रण बदलना है। यदि गन्ने से सीधे ज्यादा एथेनॉल बनाने के बजाय मक्का और चावल से उत्पादन बढ़ाया जाता है, तो चीनी मिलों के पास गन्ने से ज्यादा चीनी बनाने का विकल्प रहेगा।

सरकार के लिए यह रास्ता इसलिए भी संभव दिखाई देता है क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार मक्का और चावल के स्टॉक फिलहाल पर्याप्त हैं। ऐसे में एथेनॉल सेक्टर को वैकल्पिक फीडस्टॉक उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे एक तरफ पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य जारी रखा जा सकता है और दूसरी तरफ गन्ने से चीनी उत्पादन को प्राथमिकता दी जा सकती है।

एथेनॉल भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसका उद्देश्य पेट्रोल में पेट्रोलियम ईंधन की जगह कुछ मात्रा में एथेनॉल मिलाकर आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार और गन्ना तथा अन्य फसलों से जुड़े उद्योगों को नया बाजार मिलने जैसे संभावित फायदे हैं।

लेकिन जब चीनी की घरेलू उपलब्धता कम होने लगे, तब यही नीति सरकार के सामने दूसरी चुनौती भी पैदा कर सकती है। यदि बड़ी मात्रा में गन्ना चीनी के बजाय एथेनॉल में चला जाता है, तो बाजार में चीनी का उत्पादन कम हो सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा दोनों को साथ लेकर चलना जरूरी है।

सरकार के पास चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केवल एथेनॉल नीति ही विकल्प नहीं है। उत्पादन और स्टॉक की निगरानी, निर्यात नीति, घरेलू बिक्री व्यवस्था, स्टॉक लिमिट और आयात-निर्यात से जुड़े फैसले भी कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं। केंद्र पहले भी चीनी की घरेलू उपलब्धता के आधार पर निर्यात की अनुमति और सीमाएं बदलता रहा है। लोकसभा में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार सरकार की प्राथमिकता पहले घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराना और उसके बाद अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल तथा निर्यात की ओर भेजना है।

यानी नीति का मूल सिद्धांत यह है कि घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरत पहले पूरी हो। यदि पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहती है तो अतिरिक्त मात्रा को एथेनॉल या निर्यात की ओर मोड़ा जा सकता है। यही सोच मौजूदा संभावित नीति बदलाव के पीछे भी दिखाई देती है।

चीनी की कीमतों में लगभग 10% की बढ़ोतरी की बात भी इस समय चर्चा में है। कीमतों में बदलाव का असर देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग हो सकता है, क्योंकि थोक और खुदरा कीमतों के बीच अंतर रहता है। परिवहन लागत, स्थानीय मांग, स्टॉक और रिटेल मार्जिन जैसे कारक भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।

यदि सरकार गन्ने से एथेनॉल डायवर्जन को सीमित करती है और इससे अगले सीजन में चीनी उत्पादन बढ़ता है, तो बाजार में उपलब्धता बेहतर हो सकती है। ज्यादा सप्लाई होने पर कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना रहती है। लेकिन इसका असर तुरंत दिखाई देना जरूरी नहीं है, क्योंकि चीनी उत्पादन और बाजार आपूर्ति एक कृषि चक्र से जुड़ी प्रक्रिया है।

दूसरी तरफ यदि गन्ने से एथेनॉल बनाने की मात्रा घटती है, तो एथेनॉल उत्पादकों और डिस्टिलरी सेक्टर पर भी असर पड़ सकता है। जिन कंपनियों ने गन्ने के रस या molasses आधारित एथेनॉल उत्पादन में निवेश किया है, उन्हें अपने उत्पादन मिश्रण को बदलना पड़ सकता है। हालांकि Reuters की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौजूदा ऊंची चीनी कीमतों के कारण मिलों के लिए चीनी बेचना एथेनॉल की तुलना में अधिक आर्थिक रूप से आकर्षक हो सकता है।

इस संभावित बदलाव का किसानों पर प्रभाव थोड़ा अलग हो सकता है। अगर चीनी मिलों की आय बढ़ती है और उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत होती है, तो गन्ना भुगतान की क्षमता भी बेहतर रह सकती है। लेकिन दूसरी तरफ एथेनॉल से मिलने वाला अतिरिक्त बाजार और उसके कारण मिलों को मिलने वाला वैकल्पिक राजस्व भी महत्वपूर्ण है। इसलिए नीति में बदलाव करते समय किसानों और मिलों दोनों के हितों को ध्यान में रखना जरूरी होगा।

गन्ना किसानों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि गन्ने की खरीद कीमत और भुगतान समय पर हो। सरकार के अनुसार 2024-25 सीजन में किसानों को देय गन्ना बकाये का लगभग 99.5% भुगतान 20 अप्रैल 2026 तक हो चुका था। 2025-26 सीजन में उसी तारीख तक करीब 88.6% बकाया भुगतान हो चुका था।

चीनी उद्योग में एथेनॉल की भूमिका बढ़ने के बाद मिलों को राजस्व का एक अतिरिक्त स्रोत मिला है। पहले चीनी की कीमतों में गिरावट आने पर मिलों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ जाता था। एथेनॉल बिक्री से कुछ हद तक आय को विविध बनाने में मदद मिली। इसलिए सरकार को यह देखना होगा कि चीनी की कीमतें नियंत्रित करते समय एथेनॉल उद्योग की स्थिरता पर बहुत ज्यादा नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

आने वाले महीनों में मक्का और चावल आधारित एथेनॉल की भूमिका बढ़ना इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। यदि इन फसलों से पर्याप्त एथेनॉल उपलब्ध होता है, तो गन्ने पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे चीनी उत्पादन और एथेनॉल ब्लेंडिंग दोनों को साथ लेकर चलने का रास्ता खुल सकता है।

हालांकि मक्का और चावल की अपनी खाद्य मांग भी है। इसलिए बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल एथेनॉल में बढ़ाने से खाद्य बाजार पर भी असर पड़ सकता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वैकल्पिक फीडस्टॉक का इस्तेमाल बढ़ाने से दूसरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर अनावश्यक दबाव न बने।

इस पूरे घटनाक्रम में पेट्रोल उपभोक्ताओं के लिए भी सवाल उठता है कि यदि एथेनॉल का स्रोत बदला गया तो क्या पेट्रोल की कीमत पर असर पड़ेगा। सीधे तौर पर इसका जवाब देना अभी संभव नहीं है। पेट्रोल की खुदरा कीमतें केवल एथेनॉल की लागत से तय नहीं होतीं। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, टैक्स, रिफाइनिंग, परिवहन और अन्य लागत भी इसमें शामिल होती हैं।

इसलिए गन्ने से एथेनॉल का इस्तेमाल सीमित करने का मुख्य उद्देश्य पेट्रोल सस्ता करना नहीं, बल्कि चीनी की घरेलू उपलब्धता और कीमतों को स्थिर रखना है। एथेनॉल नीति में बदलाव को इसी संदर्भ में समझना अधिक सही होगा।

चीनी की कीमतों को लेकर सरकार पहले ही कई कदम उठा रही है। स्टॉक लिमिट इसका एक उदाहरण है। अगर बाजार में कारोबारी जरूरत से ज्यादा स्टॉक रोककर रखते हैं, तो कृत्रिम कमी पैदा हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं। स्टॉक लिमिट का उद्देश्य इसी तरह की जमाखोरी को रोकना है।

इसके साथ ही सरकार चीनी के उत्पादन और स्टॉक पर नजर रख रही है। आधिकारिक नीति के अनुसार Department of Food and Public Distribution चीनी के उत्पादन, बिक्री, निर्यात और उपलब्ध स्टॉक की निगरानी करता है ताकि घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति और स्थिर कीमतें सुनिश्चित की जा सकें।

अब असली फैसला आने वाले शुगर सीजन से पहले होगा। यदि सरकार गन्ने से एथेनॉल उत्पादन सीमित करती है, तो चीनी मिलों को उत्पादन योजना में बदलाव करना होगा। यदि मौजूदा नियम जारी रहते हैं, तो चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर सरकार को दूसरे उपायों के जरिए नियंत्रण रखना पड़ सकता है।

आम उपभोक्ता के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले महीनों में चीनी की कीमतों पर सरकार की नजर और ज्यादा सख्त रह सकती है। अगर घरेलू उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा तो कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार स्टॉक, आयात, निर्यात और एथेनॉल डायवर्जन से जुड़े फैसले ले सकती है।

कुल मिलाकर, गन्ने से एथेनॉल उत्पादन को सीमित करने की संभावित सरकारी योजना का मुख्य उद्देश्य पेट्रोल नीति को खत्म करना नहीं बल्कि चीनी की घरेलू आपूर्ति बढ़ाना और कीमतों पर नियंत्रण रखना है। मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक अगले सीजन में गन्ने के रस और B-heavy molasses के एथेनॉल उपयोग को सीमित करने तथा C-heavy molasses और मक्का-चावल जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर ज्यादा जोर देने पर विचार किया जा रहा है।

अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है, इसलिए इसे गन्ने से एथेनॉल बनाने पर पूरी तरह रोक के रूप में देखना सही नहीं होगा। आने वाले महीनों में सरकार के अंतिम नियम और एथेनॉल आवंटन से तस्वीर साफ होगी। यदि नीति में बदलाव होता है, तो इसका असर चीनी मिलों, एथेनॉल कंपनियों, गन्ना किसानों, पेट्रोलियम क्षेत्र और सबसे महत्वपूर्ण रूप से आम उपभोक्ताओं पर देखने को मिल सकता है।

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http://Sugarcane and ethanol production in India amid rising sugar prices

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