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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुंबई में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का संयुक्त प्रदर्शन

मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश में राजनीतिक और नागरिक विरोध तेज होता दिखाई दे रहा है। रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र में लंबे समय बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ सड़क पर उतरे। दोनों नेताओं ने मुंबई में ‘विराट गर्जना मोर्चा’ का नेतृत्व किया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली तथा महाराष्ट्र में चल रही मतदाता सूची की Special Intensive Revision यानी SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

दूसरी तरफ दिल्ली में भी लगातार दूसरे और तीसरे दिन प्रदर्शन देखने को मिले। आम आदमी पार्टी, AISA समेत छात्र संगठनों, वकीलों और नागरिक समाज से जुड़े लोगों ने CEC के इस्तीफे और SIR प्रक्रिया पर जवाबदेही की मांग की। कई जगह पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।

इन प्रदर्शनों की वजह सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक विरोध नहीं है। इसके पीछे मुख्य मुद्दा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी SIR है। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हुए हैं और इससे पात्र मतदाताओं के मतदान अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अन्य कारणों से अयोग्य प्रविष्टियों को हटाना है।

मुंबई में उद्धव और राज ठाकरे पहली बार फिर एक साथ दिखे

4 अक्टूबर का मुंबई प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे लंबे समय बाद एक साझा राजनीतिक मंच पर दिखाई दिए।

दोनों नेताओं ने संयुक्त रूप से ‘विराट गर्जना मोर्चा’ निकाला। प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और महाराष्ट्र में चल रही SIR प्रक्रिया को रद्द करने की मांग थी। मार्च दक्षिण मुंबई से शुरू होकर BMC मुख्यालय की ओर गया। कांग्रेस और शरद पवार गुट वाली NCP (SP) के नेता भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए।

इस प्रदर्शन की एक खास बात यह रही कि कार्यक्रम में पार्टी के झंडों और चुनाव चिह्नों के बजाय तिरंगे को प्रमुखता दी गई। इसका उद्देश्य इसे किसी एक राजनीतिक दल के कार्यक्रम की जगह चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े व्यापक आंदोलन के रूप में पेश करना था।

उद्धव और राज ठाकरे के एक साथ आने को महाराष्ट्र की राजनीति में भी अहम घटनाक्रम माना जा रहा है। दोनों नेताओं की राजनीतिक राह लंबे समय से अलग रही है, इसलिए किसी मुद्दे पर एक मंच साझा करना अपने आप में बड़ी खबर बन गया।

राज ठाकरे ने SIR और EVM को लेकर उठाए सवाल

प्रदर्शन के दौरान राज ठाकरे ने चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए। उन्होंने मतदाता सूची में बड़े बदलावों को लेकर चिंता जताई और SIR को समाप्त करने की मांग की।

राज ठाकरे ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM को लेकर भी सवाल उठाए और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग रखी। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया।

हालांकि, इन आरोपों और मांगों को राजनीतिक नेताओं के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए। किसी चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी या वोट चोरी जैसे आरोपों को अंतिम तथ्य मानने से पहले आधिकारिक जांच और प्रमाण जरूरी हैं।

यही वजह है कि इस पूरे विवाद को समझते समय प्रदर्शनकारियों के आरोप और चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रक्रिया दोनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

उद्धव ठाकरे ने भी चुनाव आयोग पर निशाना साधा

उद्धव ठाकरे ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल में नहीं आने को लेकर चिंता व्यक्त की।

विपक्षी दलों का कहना है कि अगर किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से बाहर हो जाता है तो उसके मतदान के संवैधानिक अधिकार पर असर पड़ सकता है। उनका तर्क है कि ऐसे मामलों में पर्याप्त सूचना, आपत्ति और सुधार की प्रक्रिया आसान और पारदर्शी होनी चाहिए।

महाराष्ट्र में SIR के ड्राफ्ट रोल से जुड़े आंकड़े वास्तव में काफी बड़े हैं। लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए—ड्राफ्ट रोल में नाम नहीं होना और किसी व्यक्ति का अंतिम रूप से मतदाता सूची से हट जाना एक ही बात नहीं है।

चुनाव आयोग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार SIR के दौरान करीब 2.07 करोड़ Enumeration Forms को uncollectable के रूप में चिह्नित किया गया था। इनमें absent/not found, permanently shifted, deceased, duplicate या अन्य श्रेणियां शामिल थीं।

2.07 करोड़ नामों को लेकर सबसे ज्यादा विवाद

महाराष्ट्र में SIR को लेकर सबसे बड़ा विवाद इसी आंकड़े के आसपास है। ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद करीब 2.07 करोड़ नाम ड्राफ्ट रोल में शामिल नहीं थे।

लेकिन चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि इस संख्या को अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की संख्या नहीं समझना चाहिए। ड्राफ्ट प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं को दावे और आपत्तियां दर्ज करने का अवसर दिया जाता है।

यानी अगर किसी पात्र मतदाता का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, तो वह प्रक्रिया के तहत अपना दावा प्रस्तुत कर सकता है।

महाराष्ट्र में चुनाव आयोग ने दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा भी बढ़ाई थी। सितंबर के अंत में आयोग ने claims, suggestions और objections के लिए समयसीमा को 12 दिन बढ़ाकर 12 अक्टूबर तक किया था।

यही प्रक्रिया इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चुनाव आयोग का क्या कहना है?

चुनाव आयोग के अनुसार SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अपडेट करना है। चुनावी सूची में ऐसे नाम हो सकते हैं जो व्यक्ति की मृत्यु, स्थायी रूप से स्थान बदलने, डुप्लीकेट पंजीकरण या अन्य कारणों से अब पात्र नहीं हैं।

ECI की आधिकारिक वेबसाइट पर SIR 2026 से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिनमें मतदाता सूची में नाम खोजने, पिछले SIR की सूची देखने और आवश्यक फॉर्म भरने की सुविधाएं शामिल हैं।

महाराष्ट्र के Chief Electoral Officer की वेबसाइट पर भी SIR 2026 से जुड़ी जानकारी, draft electoral roll, claims and objections तथा नाम खोजने की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।

इसलिए अगर किसी मतदाता को अपना नाम नहीं मिल रहा है तो केवल सोशल मीडिया पोस्ट देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय आधिकारिक पोर्टल पर नाम जांचना ज्यादा सही तरीका है।

दिल्ली में AAP और छात्र संगठन भी सड़क पर

मुंबई के साथ-साथ दिल्ली में भी CEC के खिलाफ प्रदर्शन लगातार जारी रहे।

2 अक्टूबर को दिल्ली में AAP, छात्र संगठनों और नागरिक समाज से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किया था। पुलिस के अनुसार जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी वहां पहुंचने की कोशिश करते रहे और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया।

3 अक्टूबर को प्रदर्शन का दूसरा दिन रहा। इस दौरान AISA अध्यक्ष नेहा बोरा, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल समेत कई लोग प्रदर्शन में शामिल हुए।

दिल्ली पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। पुलिस का कहना था कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं दी गई थी।

इससे मामला सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा। छात्र संगठनों और नागरिक समाज के लोगों ने भी इसे मतदाता अधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़कर विरोध किया।

AAP नेताओं की भी हुई हिरासत

दिल्ली के पहले दिन के प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज, आतिशी और संजय सिंह समेत कई नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।

AAP का कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है और प्रदर्शन के लिए पहले अनुमति मांगी गई थी। पुलिस की ओर से अनुमति नहीं दिए जाने के कारण विवाद बढ़ा।

दूसरी ओर प्रशासन की चिंता कानून-व्यवस्था और प्रतिबंधित क्षेत्रों में बड़ी भीड़ को लेकर रही।

इस तरह दिल्ली में विवाद का एक दूसरा पहलू भी सामने आया—मतदाता सूची और SIR के मुद्दे के साथ-साथ प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था का सवाल।

छात्र संगठनों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

इस आंदोलन में छात्र संगठनों की भागीदारी विशेष रूप से चर्चा में है।

AISA और दूसरे छात्र समूहों का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में होने वाले बदलाव सीधे युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं को भी प्रभावित करते हैं।

3 अक्टूबर को छात्र नेताओं और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर की ओर मार्च करने की कोशिश की। पुलिस ने बैरिकेडिंग की और कई लोगों को हिरासत में लिया।

4 अक्टूबर को भी दिल्ली में AISA और अन्य संगठनों ने CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन मार्च किया।

यानी तीन दिनों के दौरान दिल्ली में विरोध की अलग-अलग गतिविधियां देखने को मिलीं और आंदोलन लगातार चर्चा में रहा।

तीन दिनों में तीन बड़े प्रदर्शन की तस्वीर

2 से 4 अक्टूबर के बीच घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ा।

2 अक्टूबर: मुंबई के शिवाजी पार्क में CJP का बड़ा प्रदर्शन हुआ। दिल्ली में भी AAP, छात्र संगठनों और नागरिक समाज के लोगों ने जंतर-मंतर की ओर प्रदर्शन किया।

3 अक्टूबर: दिल्ली में anti-CEC प्रदर्शन का दूसरा दिन रहा। AISA, वकीलों और नागरिक समाज के लोगों ने मार्च किया। कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया।

4 अक्टूबर: मुंबई में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने संयुक्त ‘विराट गर्जना मोर्चा’ निकाला। दिल्ली में भी छात्र संगठन और दूसरे समूह CEC के खिलाफ सड़क पर उतरे।

इस तरह तीन दिनों में अलग-अलग शहरों में विरोध का सिलसिला दिखाई दिया।

दिल्ली पुलिस ने FIR भी दर्ज की

2 अक्टूबर के दिल्ली प्रदर्शन के बाद पुलिस ने तीन FIR दर्ज कीं। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार दो FIR Parliament Street Police Station और एक Connaught Place Police Station में दर्ज की गईं।

इनमें BNS की ऐसी धाराएं लगाई गईं जो सार्वजनिक अधिकारी के आदेश की अवहेलना, सरकारी काम में बाधा और अन्य संबंधित आरोपों से जुड़ी थीं। रिपोर्ट के अनुसार FIR में किसी व्यक्ति या संगठन को नामजद आरोपी नहीं बनाया गया था।

यह घटनाक्रम बताता है कि आंदोलन अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति भी बनी है।

मुंबई में पुलिस ने प्रदर्शन को कैसे संभाला?

मुंबई में 2 अक्टूबर को CJP का प्रदर्शन पुलिस द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने के बावजूद हुआ था। इसके बाद पुलिस कार्रवाई और FIR की खबरें भी सामने आईं। वहीं 4 अक्टूबर का ठाकरे बंधुओं का मार्च अलग राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में आयोजित हुआ।

4 अक्टूबर के संयुक्त मार्च में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक मौजूद रहे। कांग्रेस और NCP (SP) के नेताओं की भागीदारी ने इसे विपक्षी दलों के व्यापक कार्यक्रम का रूप दिया।

इस प्रदर्शन का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि उद्धव और राज ठाकरे लंबे समय बाद किसी बड़े सार्वजनिक राजनीतिक मुद्दे पर साथ नजर आए।

क्या यह उद्धव-राज ठाकरे की नई राजनीतिक दोस्ती है?

यह सवाल महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा में है।

दोनों नेताओं का पारिवारिक रिश्ता पुराना है, लेकिन राजनीतिक रूप से उनके रास्ते अलग रहे हैं। ऐसे में एक संयुक्त प्रदर्शन कई राजनीतिक संकेत देता है।

हालांकि सिर्फ एक प्रदर्शन के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों पार्टियों के बीच स्थायी गठबंधन बन गया है।

फिलहाल दोनों दलों की एकता का आधार CEC और SIR के खिलाफ संयुक्त विरोध है।

आगे यह साथ चुनावी गठबंधन में बदलता है या नहीं, यह भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

तिरंगा लेकर प्रदर्शन क्यों हुआ?

4 अक्टूबर के मुंबई मार्च में पार्टी के झंडों की जगह तिरंगे को प्रमुखता देने का निर्णय भी महत्वपूर्ण रहा।

उद्धव और राज ठाकरे के समर्थकों के इस कदम का उद्देश्य आंदोलन को पार्टी की सीमा से बाहर दिखाना था। संदेश यह था कि मुद्दा किसी एक दल की सत्ता या संगठन का नहीं बल्कि चुनाव प्रक्रिया और मतदान अधिकारों से जुड़ा है।

हालांकि राजनीतिक प्रदर्शन में प्रतीकों का इस्तेमाल भी राजनीतिक संदेश का हिस्सा होता है। इसलिए इसे आंदोलन के आयोजकों की रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।

CEC ज्ञानेश कुमार कौन हैं?

ज्ञानेश कुमार वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। Election Commission of India की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उन्होंने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें CEC के रूप में कार्यभार संभाला था। इससे पहले वे चुनाव आयुक्त के रूप में काम कर चुके थे।

CEC का पद भारतीय चुनाव व्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण है। Election Commission of India लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के प्रशासन से जुड़ी संवैधानिक संस्था है।

इसी वजह से CEC के किसी निर्णय या चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठे विवाद का राजनीतिक प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।

SIR क्या है और विवाद क्यों हुआ?

SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची की विशेष समीक्षा की प्रक्रिया है।

इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और पात्र मतदाताओं को शामिल करने के साथ-साथ ऐसी प्रविष्टियों की पहचान करना है जो मृत्यु, स्थान परिवर्तन, डुप्लीकेट पंजीकरण या अन्य कारणों से अब सही नहीं हैं।

विवाद तब बढ़ा जब महाराष्ट्र की ड्राफ्ट सूची में बड़ी संख्या में पुराने रिकॉर्ड शामिल नहीं दिखे।

Indian Express के अनुसार महाराष्ट्र में SIR से पहले करीब 9.78 करोड़ electors थे और ड्राफ्ट रोल में लगभग 7.72 करोड़ नाम शामिल किए गए थे। करीब 2.07 करोड़ Enumeration Forms को uncollectable श्रेणी में रखा गया।

यही आंकड़ा विपक्ष के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया।

2.07 करोड़ का मतलब 2.07 करोड़ वोट हमेशा के लिए खत्म नहीं

यह इस पूरे विवाद का सबसे जरूरी फैक्ट-चेक है।

अगर किसी खबर में सीधे लिखा जाए कि ‘महाराष्ट्र के 2.07 करोड़ वोट काट दिए गए’, तो यह भ्रामक हो सकता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2.07 करोड़ ऐसे Enumeration Forms थे जिन्हें विभिन्न कारणों से uncollectable माना गया और ये नाम ड्राफ्ट रोल में शामिल नहीं थे। इनमें मृत व्यक्ति, स्थायी रूप से स्थानांतरित लोग, absent/not found और duplicate जैसी श्रेणियां भी थीं।

इसके बाद claims और objections की प्रक्रिया मौजूद है।

इसलिए अंतिम मतदाता सूची आने से पहले यह कहना सही नहीं होगा कि ये सभी लोग स्थायी रूप से मतदान के अधिकार से बाहर हो गए हैं।

मतदाताओं को क्या करना चाहिए?

अगर किसी मतदाता को SIR के बाद अपना नाम मतदाता सूची में नहीं मिल रहा है तो घबराने की जरूरत नहीं है।

सबसे पहले Election Commission के official voter portal पर अपना नाम जांचें। ECI के Citizen Service Portal पर SIR 2026 से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

महाराष्ट्र के मतदाता महाराष्ट्र Chief Electoral Officer की वेबसाइट पर भी अपना नाम खोज सकते हैं। वहां SIR draft electoral roll और claims/objections से जुड़ी जानकारी उपलब्ध है।

अगर नाम से search में दिक्कत आती है तो EPIC number या उपलब्ध दूसरे विवरणों से जांच करने की कोशिश की जा सकती है।

गलत नाम हटने या शामिल नहीं होने की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार claim/objection दाखिल करना जरूरी है।

आगे क्या होगा?

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध आगे भी जारी रहने की संभावना है। Reuters के अनुसार 4 अक्टूबर को भी दिल्ली और मुंबई में प्रदर्शन हुए और आगे भी कई रैलियों की घोषणा की गई है।

CJP ने भी 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़े प्रदर्शन की योजना की घोषणा की है, अगर CEC इस्तीफा नहीं देते हैं।

विपक्षी दल भी चुनाव आयोग के खिलाफ आगे संयुक्त कार्यक्रमों की तैयारी कर रहे हैं।

इसका मतलब यह है कि SIR और CEC का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बना रह सकता है।

चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वास बनाए रखने की है।

मतदाता सूची में किसी भी बदलाव को लेकर लोगों को यह भरोसा होना चाहिए कि पात्र नागरिक का नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटेगा।

दूसरी तरफ चुनाव आयोग की जिम्मेदारी यह भी है कि मतदाता सूची में मृत, duplicate या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम बने न रहें।

यही संतुलन चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है।

यदि आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी होगी, आंकड़े सार्वजनिक होंगे और पात्र मतदाताओं को सुधार का पर्याप्त अवसर मिलेगा, तो विवाद को कम किया जा सकता है।

विपक्ष के सामने भी चुनौती

विपक्षी दलों के सामने भी चुनौती है कि वे SIR को लेकर जनता के बीच तथ्यात्मक जानकारी रखें।

अगर कोई पात्र मतदाता वास्तव में सूची से बाहर हुआ है तो उसका मामला सामने लाना महत्वपूर्ण है। लेकिन हर uncollectable form को ‘वोट चोरी’ या ‘वोट खत्म’ बताने से विवाद और भ्रम बढ़ सकता है।

इसलिए राजनीतिक दलों के आरोपों और चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

लोकतंत्र में चुनावी संस्थाओं पर सवाल उठाना राजनीतिक अधिकार का हिस्सा है, लेकिन आरोपों की पुष्टि के लिए तथ्य और दस्तावेज भी जरूरी हैं।

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http://CEC ज्ञानेश कुमार और SIR प्रक्रिया के खिलाफ मुंबई में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने संयुक्त ‘विराट गर्जना मोर्चा’ निकाला।

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