>

MLC चुनाव में कांग्रेस को जीरो सीटें, मोदी का बैलेट पेपर पर तंज

चार राज्यों के विधान परिषद यानी MLC चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में कुल 28 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी नतीजे को लेकर कांग्रेस पर तंज कसते हुए सवाल किया कि जब चुनाव बैलेट पेपर से हुए, तो पार्टी को कितनी सीटें मिलीं। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब कांग्रेस इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM को लेकर लगातार सवाल उठाती रही है और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करती रही है।

इन चुनावों में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका कर्नाटक में लगा, जहां कांग्रेस की सरकार है। यहां भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) यानी JD(S) के गठबंधन ने चारों सीटों पर जीत हासिल की। बिहार में भी कांग्रेस अपने उम्मीदवारों को जीत नहीं दिला सकी। महाराष्ट्र में पार्टी जिन सीटों पर चुनाव लड़ी, वहां भी उसे सफलता नहीं मिली। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने इन MLC सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारे थे। इस तरह चार राज्यों में कांग्रेस का खाता नहीं खुला।

चुनाव के नतीजों ने EVM बनाम बैलेट पेपर की राजनीतिक बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के प्रदर्शन को उसके चुनावी तर्कों से जोड़कर निशाना साधा। हालांकि, इन नतीजों को समझने के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि MLC चुनाव आम विधानसभा चुनावों जैसे नहीं होते। इनकी मतदाता सूची, निर्वाचन क्षेत्र और मतदान की प्रक्रिया अलग होती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर क्या तंज कसा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर चार राज्यों के MLC चुनावों को लेकर कांग्रेस पर कटाक्ष किया। उन्होंने अपनी पोस्ट में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक की 28 सीटों का उल्लेख किया और कहा कि चुनाव बैलेट पेपर से हुए। इसके बाद उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं। इस पोस्ट को कांग्रेस के EVM विरोध और बैलेट पेपर की मांग के संदर्भ में देखा गया।

मोदी के इस बयान का राजनीतिक संदेश साफ था। भाजपा का तर्क है कि यदि किसी पार्टी को EVM पर आपत्ति है और वह बैलेट पेपर को बेहतर विकल्प बताती है, तो बैलेट पेपर से हुए चुनाव में भी उसके प्रदर्शन पर सवाल उठ सकते हैं। इन चुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी, इसलिए भाजपा ने इसे अपने हमले का आधार बनाया।

हालांकि, किसी चुनाव में हार या जीत अपने आप में मतदान प्रणाली की निष्पक्षता का अंतिम प्रमाण नहीं होती। चुनावी नतीजे उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों, मतदाताओं की पसंद, गठबंधन और प्रचार जैसे कई कारकों से प्रभावित होते हैं। इसलिए मोदी की टिप्पणी को राजनीतिक तंज के रूप में समझना चाहिए, न कि बैलेट पेपर या EVM की निष्पक्षता पर किसी स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष के रूप में।

कांग्रेस के लिए यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी लगातार चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे उठाती रही है। इन चुनावों में बैलेट पेपर इस्तेमाल होने के बावजूद पार्टी को कोई सीट नहीं मिली। भाजपा ने इसी तथ्य को कांग्रेस की राजनीतिक दलीलों पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया।

चार राज्यों की 28 MLC सीटों पर हुआ था चुनाव

उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में कुल 28 विधान परिषद सीटों के लिए चुनाव हुए। इनमें शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें शामिल थीं। मतदान 23 अक्टूबर को हुआ था और मतगणना 27 अक्टूबर से शुरू हुई। 28 अक्टूबर को परिणामों और मतगणना के रुझानों ने कांग्रेस के लिए निराशाजनक तस्वीर पेश की।

इन सीटों पर मतदान का स्वरूप आम विधानसभा चुनाव से अलग होता है। MLC की शिक्षक और स्नातक सीटों पर हर नागरिक सीधे वोट नहीं देता। संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में पंजीकृत योग्य मतदाता ही मतदान कर सकते हैं। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता और पंजीकरण से जुड़ी शर्तें लागू होती हैं, जबकि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए पात्र शिक्षकों की अलग मतदाता सूची होती है।

इस वजह से इन चुनावों में उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, शिक्षकों और स्नातकों से जुड़े मुद्दे, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं तक पहुंच महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यहां मतदान का दायरा सामान्य चुनावों की तुलना में सीमित होता है, लेकिन नतीजों का राजनीतिक महत्व कम नहीं होता।

चारों राज्यों में कुल 28 सीटों पर चुनाव होने के कारण सभी पार्टियों के प्रदर्शन की तुलना की गई। कांग्रेस ने कुल 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और इन सभी पर उसे हार का सामना करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में पार्टी ने उम्मीदवार नहीं उतारे, इसलिए वहां की सीटों पर कांग्रेस की हार का आंकड़ा सीधे उसके चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

कर्नाटक में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका

कर्नाटक के नतीजे कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा चर्चा में रहे, क्योंकि राज्य में उसी की सरकार है। चार विधान परिषद सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा और JD(S) गठबंधन ने सभी सीटें जीत लीं। भाजपा ने अपनी तीन सीटें बरकरार रखीं, जबकि JD(S) ने बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के मौजूदा MLC पुत्तन्ना को हराकर सीट अपने नाम की।

बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला खास तौर पर महत्वपूर्ण माना गया। यहां JD(S) के उम्मीदवार ए.पी. रंगनाथ ने कांग्रेस के पुत्तन्ना को 908 वोटों से हराया। यह परिणाम इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि पुत्तन्ना पहले से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। किसी मौजूदा MLC का चुनाव हारना बताता है कि स्थानीय निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला कितना कड़ा हो सकता है।

कर्नाटक में भाजपा और JD(S) के गठबंधन ने मिलकर चुनाव लड़ा। भाजपा ने तीन सीटें जीतीं और JD(S) को एक सीट मिली। इस नतीजे ने गठबंधन के बीच चुनावी तालमेल को लेकर भी चर्चा बढ़ाई। दोनों दलों ने इस जीत को अपनी राजनीतिक रणनीति के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा।

कांग्रेस के लिए चुनौती इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि राज्य में सरकार होने के बावजूद पार्टी अपने उम्मीदवारों को विधान परिषद चुनाव में जीत नहीं दिला सकी। हालांकि, MLC चुनाव का मतदाता वर्ग सीमित होता है, इसलिए इन नतीजों को सीधे पूरे राज्य के मतदाताओं की राय या भविष्य के विधानसभा चुनाव का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता।

फिर भी, सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अपने ही राज्य में चारों सीटें गंवाना संगठन और स्थानीय चुनाव प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े कर सकता है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि किन निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवारों को समर्थन नहीं मिला और क्या स्थानीय मुद्दे, संगठन की सक्रियता या गठबंधन की स्थिति ने परिणाम को प्रभावित किया।

बिहार में कांग्रेस का खाता नहीं खुला, जन सुराज को मिली जीत

बिहार में आठ MLC सीटों के लिए चुनाव हुआ था। कांग्रेस ने इनमें से पांच सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन उसे किसी भी सीट पर जीत नहीं मिली। पार्टी के लिए सबसे चर्चित हार दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में रही, जहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मौजूदा MLC मदन मोहन झा को जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय ने हराया। रिपोर्टों के अनुसार, जीत का अंतर 324 वोट रहा।

दरभंगा सीट का परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि जन सुराज पार्टी ने बिहार विधान परिषद में अपना खाता खोला। पार्टी के लिए यह एक अहम उपलब्धि थी। इसने दिखाया कि सीमित निर्वाचन क्षेत्र वाले चुनावों में भी नए राजनीतिक दल स्थानीय संपर्क और उम्मीदवार की पहचान के आधार पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं।

बिहार की आठ सीटों पर अलग-अलग दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ। उपलब्ध परिणामों के अनुसार, भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) के उम्मीदवारों को भी जीत मिली, जबकि राष्ट्रीय जनता दल और जन सुराज पार्टी ने भी सीटें हासिल कीं। कुछ सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने सफलता पाई। इस कारण बिहार के परिणामों को केवल एक गठबंधन की जीत या हार के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाएगा।

कांग्रेस के लिए बिहार का परिणाम इसलिए अहम है क्योंकि पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन वह कोई सीट नहीं जीत सकी। खासकर दरभंगा जैसी सीट पर हार ने पार्टी के स्थानीय संगठन और शिक्षक मतदाताओं के बीच समर्थन पर सवाल खड़े किए।

बिहार में MLC चुनाव के परिणामों को आगामी राजनीतिक गतिविधियों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। हालांकि, शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग सीमित होने के कारण इन नतीजों को विधानसभा चुनाव के परिणाम का सीधा पूर्वानुमान नहीं माना जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला

उत्तर प्रदेश में 11 विधान परिषद सीटों के लिए चुनाव हुआ। कांग्रेस ने यहां उम्मीदवार नहीं उतारे, इसलिए पार्टी इन सीटों पर सीधे मुकाबले में नहीं थी। भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच कई निर्वाचन क्षेत्रों में मुकाबला देखने को मिला। 28 अक्टूबर को उपलब्ध रिपोर्टों में भाजपा और सपा के खाते में कई सीटें जाने की जानकारी सामने आई, जबकि कुछ सीटों पर मतगणना जारी थी।

उत्तर प्रदेश के नतीजों को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राज्य में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों के लिए शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में प्रदर्शन राजनीतिक संकेत दे सकता है। हालांकि, इन सीटों का मतदाता वर्ग सीमित है, इसलिए इसे पूरे राज्य की चुनावी तस्वीर का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं माना जा सकता।

उत्तर प्रदेश में MLC चुनावों में शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की प्राथमिकताएं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी हो सकती हैं। शिक्षकों की सेवा शर्तें, शिक्षा व्यवस्था, रोजगार, उच्च शिक्षा और प्रशासन से संबंधित विषय उम्मीदवारों के प्रचार में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए किसी पार्टी के प्रदर्शन का आकलन करते समय स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की पहचान को भी देखना जरूरी है।

भाजपा ने इन चुनावों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश की, जबकि समाजवादी पार्टी ने भी कई सीटों पर मुकाबला किया। कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में कोई सीट नहीं जीतने की बात तकनीकी रूप से अलग है, क्योंकि पार्टी ने इन सीटों पर उम्मीदवार ही नहीं उतारे थे। इस अंतर को समझना जरूरी है, ताकि चुनाव परिणामों की सही व्याख्या की जा सके।

महाराष्ट्र में कांग्रेस को नुकसान, गठबंधन की स्थिति भी चर्चा में

महाराष्ट्र में पांच विधान परिषद सीटों के लिए चुनाव हुआ। कांग्रेस ने इनमें से तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे किसी भी सीट पर जीत नहीं मिली। उपलब्ध रिपोर्टों में भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के उम्मीदवारों की जीत तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के उम्मीदवारों के प्रदर्शन का उल्लेख किया गया। कुछ समय तक मतगणना जारी रहने के कारण अलग-अलग रिपोर्टों में सीटों की स्थिति बदलती रही।

महाराष्ट्र की राजनीति में गठबंधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां भाजपा और उसके सहयोगियों का गठबंधन महायुति कहलाता है, जबकि विपक्षी दलों का एक प्रमुख गठबंधन महा विकास आघाड़ी के नाम से जाना जाता है। विधान परिषद के इन चुनावों में उम्मीदवारों के चयन, सीटों के बंटवारे और स्थानीय समर्थन का असर परिणामों पर पड़ा।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता यह रही कि उसने जिन तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे, उनमें से कोई भी सीट नहीं जीत सकी। कुछ सीटें ऐसी भी थीं जिन्हें पार्टी पहले जीत चुकी थी। ऐसे में परिणाम संगठन की रणनीति और स्थानीय मतदाताओं से संपर्क के लिहाज से समीक्षा की मांग करते हैं।

महाराष्ट्र के नतीजों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि सभी सीटों की मतगणना एक ही समय पर पूरी नहीं हुई थी। इसलिए शुरुआती रुझानों और अंतिम घोषित परिणामों में अंतर हो सकता है। किसी भी सीट के बारे में अंतिम दावा करने से पहले निर्वाचन आयोग या संबंधित निर्वाचन अधिकारी की घोषणा को प्राथमिकता देनी चाहिए।

NDA को कितनी सीटें मिलीं और परिणाम का राजनीतिक मतलब क्या है?

चार राज्यों की 28 MLC सीटों के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों का प्रदर्शन कई जगह मजबूत रहा। कर्नाटक में NDA के सहयोगियों ने सभी चार सीटें जीतीं। उत्तर प्रदेश में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला रहा, जबकि बिहार में भाजपा, JD(U), RJD, जन सुराज और निर्दलीय उम्मीदवारों को अलग-अलग सीटों पर सफलता मिली। महाराष्ट्र में भी गठबंधन के उम्मीदवारों ने कुछ सीटों पर जीत दर्ज की।

आपकी दी गई हेडलाइन में NDA की 16 सीटों की जीत का उल्लेख है। चुनाव की मतगणना के दौरान अलग-अलग समय पर घोषित नतीजों और रुझानों में बदलाव आया था, इसलिए 16 सीटों के आंकड़े को उस समय की रिपोर्टिंग के संदर्भ में पढ़ना चाहिए। चार राज्यों की सभी 28 सीटों का अंतिम पार्टीवार ब्योरा प्रकाशित करते समय ताजा आधिकारिक परिणामों से मिलान करना जरूरी है।

राजनीतिक तौर पर इन नतीजों का सबसे स्पष्ट संदेश कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन से जुड़ा है। पार्टी ने जिन 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, उनमें से कोई भी नहीं जीत सकी। कर्नाटक में सत्ता में होने के बावजूद हार और बिहार में पूर्व MLC की पराजय ने पार्टी के लिए संगठनात्मक सवाल खड़े किए हैं।

दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए यह परिणाम उन निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाए रखने या मजबूत करने का अवसर है जहां उन्होंने जीत दर्ज की। लेकिन विधान परिषद के सीमित मतदाता वर्ग को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि यही नतीजे अगले विधानसभा चुनावों का परिणाम तय कर देंगे।

बैलेट पेपर और EVM पर बहस फिर तेज

इन चुनावों के बाद बैलेट पेपर बनाम EVM की बहस फिर सामने आई है। कांग्रेस और विपक्षी दल समय-समय पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। वहीं, भाजपा ने कांग्रेस के MLC चुनाव में शून्य सीटों के प्रदर्शन को इस बहस में अपने पक्ष का तर्क बनाया।

प्रधानमंत्री मोदी की पोस्ट का केंद्र यही था कि चुनाव बैलेट पेपर से हुए, फिर भी कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिली। भाजपा नेताओं ने भी इसी आधार पर कांग्रेस पर निशाना साधा। उनके मुताबिक, पार्टी की हार को केवल EVM से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

लेकिन चुनावी विश्लेषण में दो बातें अलग रखना जरूरी है। पहली, किसी पार्टी का प्रदर्शन और दूसरी, मतदान प्रणाली की निष्पक्षता। किसी पार्टी को हार मिलने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि कोई मतदान प्रणाली बेहतर या खराब है। उसी तरह, केवल जीत के आधार पर भी किसी प्रणाली के बारे में अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

बैलेट पेपर और EVM दोनों के बारे में बहस करते समय चुनावी प्रक्रिया, सुरक्षा उपायों, मतगणना और आधिकारिक जांच से जुड़े प्रमाण महत्वपूर्ण होते हैं। राजनीतिक बयान बहस को तेज कर सकते हैं, लेकिन किसी प्रणाली के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र और तथ्य-आधारित आकलन की जरूरत होती है।

इसलिए मोदी का बयान राजनीतिक रूप से अहम है, लेकिन इसे एक तंज और राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में समझना चाहिए। चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस को जरूर झटका दिया है, मगर EVM या बैलेट पेपर की निष्पक्षता पर अंतिम फैसला केवल इन नतीजों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

MLC चुनाव आम विधानसभा चुनाव से कैसे अलग होते हैं?

विधान परिषद यानी Legislative Council राज्य विधानमंडल का ऊपरी सदन है। जिन राज्यों में विधान परिषद मौजूद है, वहां इसके सदस्य अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों और निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से चुने जाते हैं। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

विधानसभा चुनाव में आम तौर पर संबंधित विधानसभा क्षेत्र के सभी पात्र मतदाता मतदान करते हैं। इसके विपरीत, शिक्षक और स्नातक MLC सीटों पर केवल पात्र और पंजीकृत मतदाता ही वोट डाल सकते हैं। इसलिए इन चुनावों का सामाजिक और पेशागत दायरा सीमित होता है।

इन चुनावों में उम्मीदवारों के व्यक्तिगत संपर्क, स्थानीय संगठन, शिक्षकों और स्नातकों से जुड़े मुद्दों तथा मतदाता सूची में पंजीकरण का महत्व अधिक हो सकता है। किसी पार्टी को इन सीटों पर जीत दिलाने के लिए केवल राज्यव्यापी लोकप्रियता ही पर्याप्त नहीं होती; उसे संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में प्रभावी प्रचार और मतदाताओं तक पहुंच भी बनानी पड़ती है।

यही कारण है कि MLC चुनावों के नतीजों को विधानसभा चुनावों के बराबर मानकर देखना सही नहीं होगा। ये परिणाम राजनीतिक दलों के संगठन, उम्मीदवारों की पकड़ और स्थानीय समर्थन के बारे में महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं, लेकिन पूरे राज्य के मतदाताओं की राय का पूरा चित्र नहीं पेश करते।

कांग्रेस के सामने अब क्या चुनौती है?

चार राज्यों में MLC चुनावों में शून्य सीटें मिलने के बाद कांग्रेस के सामने अपने संगठन और उम्मीदवार चयन की समीक्षा करने की चुनौती है। पार्टी को यह देखना होगा कि जिन 12 सीटों पर उसने चुनाव लड़ा, वहां उसके उम्मीदवारों को कितना समर्थन मिला और हार के पीछे कौन-से स्थानीय कारण रहे।

कर्नाटक में सत्ता में रहते हुए चारों सीटें हारना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार होने के बावजूद किसी पार्टी के उम्मीदवार स्थानीय निर्वाचन क्षेत्रों में हार सकते हैं, क्योंकि MLC चुनावों में मतदाता वर्ग सीमित होता है और स्थानीय मुद्दों का प्रभाव अलग हो सकता है। कांग्रेस को इस नतीजे का विश्लेषण करते समय उम्मीदवारों की लोकप्रियता, संगठन की सक्रियता और गठबंधन की स्थिति को देखना होगा।

बिहार में कांग्रेस के लिए दरभंगा शिक्षक सीट की हार भी समीक्षा का विषय हो सकती है। यहां पार्टी के मौजूदा MLC मदन मोहन झा को जन सुराज उम्मीदवार से हार मिली। इस नतीजे ने एक नए राजनीतिक दल को विधान परिषद में प्रवेश दिलाया और स्थानीय स्तर पर मुकाबले की प्रकृति को भी दिखाया।

महाराष्ट्र में जिन सीटों पर कांग्रेस ने उम्मीदवार उतारे, वहां हार के कारणों की जांच करना भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा। केवल राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों के आधार पर इन चुनावों का विश्लेषण करने के बजाय स्थानीय मतदाताओं की प्राथमिकताओं और उम्मीदवारों के अभियान पर ध्यान देना जरूरी है।

PM मोदी ने ओडिशा में RBI डेटा सेंटर खोला: बैंकिंग को बैकअप

http://MLC चुनाव में बैलेट पेपर से मतदान और मतगणना

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जाह्नवी कपूर पेड्डी विवाद पर बोलीं: रोल को लेकर शर्मिंदा हूं स्पेन में ट्रेन हादसा: 64 की मौत, हाई-स्पीड ट्रेनों की टक्कर प्रभास की Fauzi का टीजर हटाने की मांग, नेताजी के रिश्तेदार ने PM मोदी को टैग किया बीपी सिंह का निधन: CID और आहट के निर्माता नहीं रहे X Money: Like दबाकर भेज सकेंगे $1 टिप, जानें कैसे काम करेगा