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चीनी की कीमत 18% घटी: ₹67 से ₹55 किलो हुआ एक्स-मिल भाव, जल्द सस्ती होगी Sugar

त्योहारों के मौसम से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों से परेशान उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर सामने आई है। सरकार के मुताबिक चीनी की एक्स-मिल कीमत, यानी कारखाने से निकलने के समय चीनी का भाव, रिकॉर्ड स्तर से करीब 18% घटकर ₹55 प्रति किलोग्राम पर आ गया है। पिछले सप्ताह एक्स-मिल कीमत करीब ₹67 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थी। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने 25 अगस्त 2026 को बताया कि सरकार की ओर से कच्ची चीनी के आयात की अनुमति देने और जमाखोरी-सट्टेबाजी पर कार्रवाई के बाद कीमतों में गिरावट शुरू हुई है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि दुकानों पर आज से ही चीनी ₹55 किलो मिलने लगेगी। एक्स-मिल, थोक और खुदरा कीमतों के बीच परिवहन, पैकेजिंग, व्यापार मार्जिन और दूसरे खर्च जुड़े होते हैं। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 24 अगस्त को देश में चीनी का औसत थोक भाव ₹58.29 प्रति किलोग्राम, जबकि औसत खुदरा भाव ₹63.05 प्रति किलोग्राम था। इसलिए मिल स्तर पर आई गिरावट का असर खुदरा बाजार तक पहुंचने में कुछ समय लग सकता है।

इस पूरी कहानी को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि चीनी की कीमत अचानक इतनी क्यों बढ़ी थी और अब इसमें गिरावट कैसे शुरू हुई। पिछले कुछ सप्ताह में देश में चीनी के दाम तेजी से ऊपर गए थे। सरकार के मुताबिक 20 जुलाई को औसत खुदरा कीमत ₹48.18 प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई थी। सरकार ने इस तेजी के पीछे घरेलू उत्पादन में उम्मीद से कमी, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, मौसम से गन्ने की फसल को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति की स्थिति और कुछ हिस्सों में जमाखोरी एवं सट्टेबाजी जैसे कई कारण बताए थे।

यानी चीनी की महंगाई को केवल एक कारण से जोड़ना सही नहीं होगा। पिछले दिनों सोशल मीडिया और बाजार में यह चर्चा भी हुई कि पेट्रोल में ethanol blending बढ़ने के कारण चीनी की उपलब्धता कम हुई और इसी वजह से कीमतें बढ़ीं। लेकिन केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज किया है। उपभोक्ता मंत्रालय के अनुसार 2022-23 में ethanol production के लिए sugar diversion करीब 12% था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9% रह गया है। सरकार ने यह भी कहा कि देश में बनने वाले ethanol का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब grains, खासकर maize से आता है।

चीनी की कीमतों में तेजी के बीच सरकार ने बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए। सबसे बड़ा कदम 10 लाख टन यानी 1 million metric tonnes कच्ची चीनी के duty-free import की अनुमति देना था। सरकार का उद्देश्य था कि घरेलू बाजार में अतिरिक्त supply लाई जाए और त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने के बावजूद कीमतों पर दबाव कम रखा जा सके।

सरकार ने सिर्फ आयात पर भरोसा नहीं किया। उसने चीनी की जमाखोरी पर नियंत्रण के लिए stock limits भी लागू कीं। 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक देशभर में चीनी dealers के लिए 400 टन की stock limit लागू की गई है। इसके अलावा 1 सितंबर से बड़े bulk consumers को अपनी 15 दिन की खपत से ज्यादा चीनी stock करने की अनुमति नहीं होगी। सरकार ने कहा है कि इन कदमों का उद्देश्य artificial shortage और speculative stocking को रोकना है।

यही कार्रवाई अब बाजार में असर दिखाती नजर आ रही है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा के मुताबिक पिछले सप्ताह ₹67 प्रति किलो तक पहुंची एक्स-मिल कीमत अब ₹55 प्रति किलो पर आ गई है। ₹67 से ₹55 की गिरावट लगभग 17.9% बैठती है, जिसे करीब 18% कहा जा रहा है। सरकार का कहना है कि आने वाले दिनों में मिल स्तर पर कीमतों में और नरमी आ सकती है।

यहां एक्स-मिल कीमत को समझना बेहद जरूरी है। जब चीनी किसी sugar mill से बाहर निकलती है तो मिल द्वारा तय कीमत को आम तौर पर ex-mill price कहा जाता है। इसके बाद चीनी थोक व्यापारी, distributor और retailer के जरिए बाजार तक पहुंचती है। रास्ते में transportation, handling, storage, packaging और व्यापारिक मार्जिन जैसे खर्च जुड़ते हैं। इसलिए एक्स-मिल कीमत ₹55 होने का अर्थ यह नहीं है कि उपभोक्ता को भी उसी दिन ₹55 किलो चीनी मिलेगी।

इसी वजह से फिलहाल थोक और खुदरा बाजार में गिरावट सीमित दिखाई दे रही है। 24 अगस्त के आंकड़ों के अनुसार औसत wholesale price ₹58.29 और retail price ₹63.05 प्रति किलो था। यदि एक्स-मिल कीमत और नीचे आती है और नई supply बाजार में पहुंचती है, तो थोक बाजार में पहले असर दिख सकता है। इसके बाद खुदरा कीमतों में कमी आने की संभावना बढ़ेगी।

त्योहारों का मौसम इस पूरी स्थिति में बेहद महत्वपूर्ण है। भारत में अगस्त से नवंबर के बीच कई बड़े त्योहार आते हैं और इस दौरान मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ तथा घरों में चीनी की मांग बढ़ जाती है। सामान्य दिनों की तुलना में इस समय bulk buyers भी ज्यादा खरीदारी करते हैं। सरकार ने इसी वजह से supply को लेकर पहले से कदम उठाए हैं।

चीनी की कीमत बढ़ने का सीधा असर केवल चाय या घर में इस्तेमाल होने वाली चीनी पर नहीं पड़ता। मिठाई बनाने वाले दुकानदार, restaurants, bakeries, packaged food companies और beverage manufacturers भी चीनी के बड़े उपभोक्ता हैं। अगर sugar prices लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इन businesses की input cost बढ़ सकती है और उसका असर तैयार products की कीमतों पर पड़ सकता है।

इसीलिए सरकार की कोशिश केवल retail sugar price को कम करना नहीं है, बल्कि पूरी supply chain में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना है। अगर मिलों के पास पर्याप्त stock रहेगा और wholesale market में supply लगातार आती रहेगी तो अचानक कीमत बढ़ने की संभावना कम हो सकती है।

सरकार ने यह भी कहा है कि देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है। Indian Sugar Mills Association यानी ISMA ने भी 24 अगस्त को कहा था कि बाजार में वास्तविक shortage नहीं है और हाल की तेजी को “unnatural” बताया था। संगठन ने कुछ bulk consumers की stocking और speculative trading को कीमतों में तेजी का एक कारण बताया।

इसका मतलब है कि सरकार और sugar industry दोनों के बीच एक बात पर जोर दिया जा रहा है कि बाजार में उपलब्ध stock और उसकी distribution को बेहतर तरीके से manage किया जाए।

फिर भी supply का मुद्दा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 2025-26 sugar season में भारत का sugar production पहले के अनुमान से कम रहने की बात सामने आई है। खाद्य सचिव के अनुसार production लगभग 306 लाख टन रहा, जबकि पहले अनुमान करीब 343 लाख टन का था। हालांकि सरकार का कहना है कि देश में पर्याप्त stock मौजूद है और हाल की price spike केवल production shortage के कारण नहीं थी।

यहां अगले sugarcane crushing season की भी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। नई पेराई अक्टूबर के आसपास शुरू होती है। सरकार चाहती है कि इस बार मिलें सामान्य schedule से पहले crushing शुरू करें ताकि बाजार में नई चीनी जल्दी उपलब्ध हो सके। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने mills से 15 अक्टूबर तक crushing शुरू करने का आग्रह किया है।

नई फसल से आने वाली supply बाजार के लिए बड़ी राहत हो सकती है। अगर गन्ने की उपलब्धता ठीक रहती है और मिलें समय पर crushing शुरू करती हैं तो अक्टूबर के बाद supply pressure कम हो सकता है। इससे चीनी की कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।

हालांकि imported raw sugar का असर भी ध्यान देने लायक है। सरकार ने 10 लाख टन raw sugar के duty-free import की अनुमति दी है, लेकिन Reuters के मुताबिक mills और refiners पूरी मात्रा आयात करने के बजाय करीब आधी मात्रा ही आयात कर सकते हैं। इसकी वजह यह है कि domestic ex-mill prices गिरने के बाद imported sugar को खरीदना उतना आकर्षक नहीं रह गया है।

रिपोर्ट के अनुसार करीब 5 लाख टन तक imports होने की संभावना है, जबकि लगभग 3 लाख टन raw sugar port-based refineries के पास पहले से stock में बताई गई है। इन refineries को हाल में refined sugar घरेलू बाजार में बेचने की अनुमति भी दी गई है।

इसका मतलब यह है कि सरकार द्वारा import permission देने का psychological असर भी बाजार पर पड़ा है। Traders और mills को यह संकेत मिला कि जरूरत पड़ने पर देश में अतिरिक्त supply लाई जा सकती है। इससे speculative buying और aggressive price increases पर दबाव बन सकता है।

बाजार में कीमतें केवल वास्तविक shortage से नहीं बढ़तीं। कई बार भविष्य में shortage होने की आशंका भी traders को ज्यादा stock खरीदने के लिए प्रेरित करती है। इससे demand अचानक बढ़ती हुई दिखाई देती है और कीमतें ऊपर जा सकती हैं। यदि सरकार ऐसी स्थिति में stock limits और import measures लागू करती है तो panic buying कम हो सकती है।

हाल की चीनी कीमतों की कहानी में यही factor महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब सवाल यह है कि आम उपभोक्ता को चीनी कितनी सस्ती मिलेगी। इसका कोई निश्चित आंकड़ा अभी नहीं दिया जा सकता। सरकार ने कहा है कि ex-mill prices में और गिरावट आ सकती है, लेकिन retail price किस स्तर तक जाएगी, यह supply, demand, transport costs और retailers के margins पर निर्भर करेगा।

अगर ex-mill price ₹55 से और नीचे जाती है और wholesale market में supply बढ़ती है तो खुदरा कीमत में भी कमी आने की संभावना है। लेकिन retail price में गिरावट आम तौर पर mill price की तुलना में थोड़ी देर से दिखाई देती है।

उदाहरण के लिए, अगर किसी व्यापारी ने चीनी पहले ही ज्यादा कीमत पर खरीदी है तो वह उसका पूरा stock तुरंत कम कीमत पर बेचने की स्थिति में नहीं हो सकता। पुराना inventory खत्म होने और नई कम कीमत वाली supply आने के बाद retail market में गिरावट ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।

इसी कारण आने वाले कुछ दिनों के price data पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के daily price data से भी स्थिति को समझा जा सकता है। 20 जुलाई से 20 अगस्त के बीच retail sugar price में काफी तेज वृद्धि हुई थी। अब अगर लगातार कई दिनों तक wholesale और retail prices नीचे आते हैं तो यह संकेत होगा कि ex-mill price की गिरावट वास्तव में consumers तक पहुंच रही है।

चीनी के अलावा इस घटनाक्रम का असर sugarcane farmers और sugar mills पर भी पड़ सकता है। बहुत ज्यादा कीमत किसानों के लिए सकारात्मक लग सकती है, लेकिन sugar industry में raw material cost, government controls, export policy, ethanol policy और domestic prices के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है।

अगर चीनी की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ती है तो उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ता है। वहीं अगर कीमतें बहुत नीचे चली जाएं तो mills की profitability प्रभावित हो सकती है और किसानों के गन्ना भुगतान पर भी दबाव आ सकता है। इसलिए सरकार को price stability और industry sustainability के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

भारत में sugar industry का महत्व केवल मिठास या घरेलू consumption तक सीमित नहीं है। गन्ने से sugar के साथ ethanol और अन्य by-products भी जुड़े हैं। इस वजह से sugar economy agriculture, fuel policy, food inflation और rural economy से भी जुड़ जाती है।

इसीलिए ethanol को लेकर भी चर्चा तेज रहती है। लेकिन इस बार केंद्र सरकार ने साफ किया है कि मौजूदा price increase को केवल ethanol diversion से जोड़ना सही नहीं है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार sugar diversion का हिस्सा 2022-23 की तुलना में कम हुआ है।

एक अन्य factor मौसम भी है। गन्ना water-intensive crop है और मौसम में बदलाव उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। सरकार ने हालिया price rise के कारणों में weather-related crop damage को भी शामिल किया है।

अगर अगले season में गन्ने की फसल अच्छी रहती है तो supply स्थिति बेहतर हो सकती है। लेकिन अगर मौसम संबंधी समस्याएं बनी रहती हैं तो sugar prices पर फिर दबाव आ सकता है। इसलिए सिर्फ वर्तमान price decline देखकर यह मान लेना कि चीनी हमेशा के लिए सस्ती हो गई है, सही नहीं होगा।

Global sugar market भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के बड़े sugar producers में शामिल है और domestic availability के साथ export-import policy भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है। अगर international sugar prices बढ़ती हैं तो exports ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं, जबकि domestic shortage की स्थिति में सरकार imports को बढ़ावा दे सकती है।

इस बार सरकार ने domestic consumer interest को प्राथमिकता देते हुए raw sugar imports की अनुमति दी है। इसका उद्देश्य त्योहारों के दौरान घरेलू बाजार में supply बढ़ाना है।

सरकार की stock limit policy भी इसी strategy का हिस्सा है। 1 सितंबर से बड़े bulk consumers के लिए 15-day stock limit लागू होने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बड़े buyers जरूरत से ज्यादा sugar जमा न करें। इससे बाजार में artificial demand या shortage की स्थिति को रोकने में मदद मिल सकती है।

हालांकि यह policy businesses के लिए operational challenge भी पैदा कर सकती है। मिठाई और food manufacturers को अपनी inventory planning बदलनी पड़ सकती है। उन्हें supply chain को ज्यादा frequently manage करना होगा ताकि 15-day stock restriction के भीतर production चलता रहे।

आम consumers के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाजार में चीनी की उपलब्धता बनी हुई है और सरकार price situation पर निगरानी कर रही है। यदि आने वाले दिनों में wholesale और retail prices में लगातार गिरावट आती है तो इसका फायदा घरों और food businesses दोनों को मिल सकता है।

24 अगस्त को ₹63.05 प्रति किलो का औसत retail price और 25 अगस्त को ₹55 प्रति किलो का ex-mill price यह दिखाता है कि दोनों के बीच अभी भी करीब ₹8 प्रति किलो का अंतर है। यह अंतर पूरी तरह retail margin नहीं है, बल्कि supply chain और विभिन्न बाजार स्तरों के खर्चों से बनता है।

इसलिए अगर कोई दुकानदार अभी भी ₹60-65 किलो के आसपास चीनी बेच रहा है तो केवल ex-mill price ₹55 होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह गलत कीमत पर बेच रहा है। स्थानीय बाजार, ब्रांड, पैकेजिंग, परिवहन और खरीद की तारीख के कारण अलग-अलग जगहों पर retail price अलग हो सकती है।

फिर भी अगर नई supply कम कीमत पर आती रहती है तो retail market में competition बढ़ेगा और दुकानदारों पर कीमत कम करने का दबाव आ सकता है।

आने वाले दिनों में तीन चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेंगी—पहली, imported sugar कितनी मात्रा में देश में आती है; दूसरी, stock limits और anti-hoarding कार्रवाई का असर कितना रहता है; और तीसरी, नई sugarcane crushing season कितनी जल्दी शुरू होती है।

अगर इन तीनों मोर्चों पर supply मजबूत रहती है तो त्योहारी सीजन में चीनी की कीमतों को नियंत्रण में रखने की संभावना बढ़ेगी।

इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या retail prices ex-mill prices के अनुरूप तेजी से नीचे आती हैं। अगर mill prices तो घटती हैं लेकिन wholesale और retail prices लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार को supply chain और margins की निगरानी करनी पड़ सकती है।

फिलहाल संकेत उपभोक्ताओं के लिए सकारात्मक हैं। रिकॉर्ड ₹67 प्रति किलो के आसपास पहुंचने के बाद ex-mill price का ₹55 तक गिरना लगभग 18% की गिरावट है। सरकार का दावा है कि आने वाले दिनों में इसमें और कमी हो सकती है।

यानी जिस चीनी की कीमत कुछ दिन पहले रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की खबरों से घरेलू बजट पर दबाव बढ़ रहा था, उसमें अब राहत के संकेत दिखाई दे रहे हैं।

लेकिन आम आदमी के लिए असली राहत तब मानी जाएगी जब यह गिरावट किराना दुकानों और retail counters तक पहुंचे। फिलहाल औसत retail price ₹63.05 प्रति किलो है, इसलिए consumers को कुछ और दिनों तक बाजार की कीमतों पर नजर रखनी चाहिए।

कुल मिलाकर, चीनी बाजार में अचानक आई तेजी अब पलटती दिखाई दे रही है। सरकार के आयात फैसले, stock limits और जमाखोरी-सट्टेबाजी पर कार्रवाई के बाद ex-mill sugar price रिकॉर्ड ₹67 से गिरकर ₹55 प्रति किलो पर आ गई है। यह करीब 18% की गिरावट है। हालांकि retail market में अभी पूरी राहत नहीं पहुंची है, लेकिन सरकार और industry के संकेत बताते हैं कि आने वाले दिनों में चीनी की कीमतों में और नरमी आ सकती है।

त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले अगर नई supply समय पर आती है और बाजार में पर्याप्त stock बना रहता है, तो घरों में इस्तेमाल होने वाली चीनी के साथ मिठाई, bakery और food businesses को भी राहत मिल सकती है। दूसरी तरफ सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कीमत कम करने की कोशिश में किसानों और sugar mills के हितों पर अत्यधिक दबाव न पड़े।

फिलहाल उपभोक्ताओं के लिए सबसे अच्छी खबर यही है कि रिकॉर्ड तेजी के बाद चीनी के मिल भाव में तेज गिरावट शुरू हो चुकी है और खुदरा बाजार में भी आने वाले दिनों में इसके असर की उम्मीद है।


चीनी की कीमतें जल्द घटेंगी? ISMA बोला- देश में नहीं है कमी, त्योहारों के लिए पर्याप्त स्टॉक

http://भारत में चीनी की कीमतों में 18 प्रतिशत गिरावट और चीनी की फैक्ट्री

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