बॉलीवुड और मनोरंजन की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखाई देती है, उसके पीछे कलाकारों का संघर्ष उतना ही मुश्किल हो सकता है। किसी कलाकार को पहचान जल्दी मिल जाती है, तो किसी को सालों तक ऑडिशन, रिजेक्शन और छोटे-बड़े किरदारों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। अभिनेत्री वामिका गब्बी का सफर भी कुछ ऐसा ही रहा है। आज वह हिंदी फिल्मों और वेब सीरीज में अपने अलग-अलग किरदारों के लिए जानी जाती हैं, लेकिन एक समय ऐसा था जब उन्हें अपने अभिनय करियर पर ही संदेह होने लगा था।
वामिका ने कई इंटरव्यू में बताया है कि लगातार रिजेक्शन और मनचाहा काम नहीं मिलने के कारण 2019 में उन्होंने एक्टिंग छोड़ने के बारे में सोचा था। वह कुछ और फिल्में करके पैसे कमाना और दुनिया घूमकर यह समझना चाहती थीं कि उन्हें वास्तव में क्या करना पसंद है। इसी दौरान उन्हें फिल्ममेकर विशाल भारद्वाज के प्रोजेक्ट ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ के लिए ऑडिशन देने का मौका मिला। यह प्रोजेक्ट बाद में बंद हो गया, लेकिन इस दौरान हुई एक्टिंग वर्कशॉप ने वामिका के अभिनय को देखने का नजरिया बदल दिया।
इसके बाद ‘ग्रहन’, ‘माई’, ‘जुबली’, ‘खुफिया’ और ‘चार्ली चोपड़ा’ जैसे प्रोजेक्ट्स ने उनके करियर को नई दिशा दी। खासकर साल 2023 में आई वेब सीरीज ‘जुबली’ में नीलोफर के किरदार ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। उनकी कहानी बताती है कि रिजेक्शन के बाद भी लगातार सीखना और अपने काम पर ध्यान देना किसी कलाकार के लिए कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।
बचपन से शुरू हुआ अभिनय का सफर
वामिका गब्बी का जन्म चंडीगढ़ में हुआ। उन्होंने बहुत कम उम्र में कैमरे के सामने काम करना शुरू कर दिया था। फिल्म ‘जब वी मेट’ में भी वह एक छोटे से किरदार में नजर आई थीं। उस समय वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थीं। फिल्म में शाहिद कपूर और करीना कपूर जैसे कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव उनके लिए खास था।
हालांकि, बचपन में किसी फिल्म के सेट पर पहुंचना और आगे चलकर एक सफल अभिनेत्री बनना दो अलग बातें हैं। शुरुआती अनुभव के बावजूद वामिका को अपने लिए लगातार अच्छे अवसर तलाशने पड़े। उन्होंने पंजाबी फिल्मों के साथ-साथ दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम किया। धीरे-धीरे वह अलग-अलग भाषाओं और फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय का अनुभव बढ़ाती रहीं।
उनके शुरुआती काम में पंजाबी फिल्में ‘सिक्सटीन’, ‘निका जैलदार 2’ और ‘परहुणा’ जैसी फिल्में शामिल रहीं। इन प्रोजेक्ट्स से उन्हें क्षेत्रीय सिनेमा में काम करने का अनुभव मिला। इसके बावजूद हिंदी मनोरंजन जगत में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा।
मुंबई में रिजेक्शन ने हिला दिया आत्मविश्वास
मुंबई में काम तलाशना वामिका के लिए आसान नहीं था। वह पहले अपने शहर में अपेक्षाकृत आत्मविश्वास महसूस करती थीं, लेकिन मुंबई आने के बाद उन्हें लगातार प्रतिस्पर्धा और रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। कई बार ऑडिशन देने के बाद भी रोल नहीं मिलते थे। कभी चयन की उम्मीद बनती, तो कभी अंतिम चरण तक पहुंचने के बाद भी मौका हाथ से निकल जाता।
हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में वामिका ने बताया था कि मुंबई में रिजेक्शन के कारण उनका आत्मविश्वास कमजोर हो गया था। वह अपने काम और अपनी क्षमता पर सवाल उठाने लगी थीं। उन्हें लगता था कि शायद वह अभिनय के लिए बनी ही नहीं हैं।
मनोरंजन उद्योग में किसी कलाकार का चयन सिर्फ अभिनय के आधार पर ही नहीं होता। किरदार की जरूरत, निर्देशक की पसंद, कहानी की मांग और प्रोडक्शन की कई परिस्थितियां भी निर्णय को प्रभावित करती हैं। लेकिन लगातार रिजेक्शन झेल रहे कलाकार के लिए हर असफल ऑडिशन को निजी असफलता की तरह लेना आसान होता है।
वामिका के साथ भी ऐसा दौर आया जब उन्हें लगने लगा कि वह अपनी कला में आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। काम तो मिल रहा था, लेकिन जिस तरह के किरदार वह करना चाहती थीं, वैसे अवसर नहीं मिल रहे थे। इसी वजह से अभिनय को लेकर उनका उत्साह कम होने लगा।
‘तुम्हें कोई हीरोइन नहीं लेगा’ जैसी बातों का दबाव
वामिका के संघर्ष को लेकर हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह दावा सामने आया कि उन्हें अपने करियर के दौरान इस तरह की निराशाजनक बातें भी सुननी पड़ीं कि उन्हें कोई हीरोइन के तौर पर कास्ट नहीं करेगा। ऐसे कथन किसी कलाकार के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकते हैं, खासकर तब जब वह पहले से ही लगातार रिजेक्शन से जूझ रहा हो।
हालांकि, इस कथन के सटीक संदर्भ और इसे कहने वाले व्यक्ति की पहचान को लेकर सावधानी जरूरी है। इसे किसी खास फिल्ममेकर या कास्टिंग डायरेक्टर से जोड़कर बताने के लिए स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। वामिका के पुराने इंटरव्यू से इतना स्पष्ट है कि उन्हें काम पाने में कई बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा और एक समय वह अपने अभिनय करियर को लेकर निराश हो गई थीं।
फिल्म इंडस्ट्री में कई कलाकारों को लंबे समय तक अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कुछ कलाकारों को बड़े बैनर की फिल्म से पहचान मिलती है, जबकि कुछ को छोटे किरदारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए दर्शकों तक पहुंचने का मौका मिलता है। वामिका ने भी अलग-अलग तरह के किरदार स्वीकार करते हुए अपने अनुभव को मजबूत किया।
2019 में एक्टिंग छोड़ने का मन बनाया
वामिका के करियर का सबसे कठिन दौर 2019 के आसपास आया। उस समय वह कई साल से मुंबई में काम कर रही थीं। उन्होंने पंजाबी फिल्मों में काम किया था और उन्हें प्रोजेक्ट्स भी मिल रहे थे, लेकिन वह अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थीं।
वामिका ने टाइम्स ऑफ इंडिया और दूसरे मीडिया इंटरव्यू में बताया कि उन्होंने सोचा था कि शायद अभिनय उनके लिए सही पेशा नहीं है। वह कुछ और फिल्में करके पैसे कमाना और फिर यात्रा पर निकल जाना चाहती थीं। उनका उद्देश्य यह समझना था कि जीवन में उन्हें वास्तव में किस चीज से खुशी मिलती है।
यह फैसला उनके लिए आसान नहीं रहा होगा, क्योंकि वह बचपन से अभिनय से जुड़ी थीं। एक तरफ वर्षों की मेहनत थी, तो दूसरी तरफ अपने काम को लेकर असंतोष। ऐसी स्थिति में किसी कलाकार के लिए आगे बढ़ने का रास्ता तय करना कठिन हो सकता है।
वामिका ने यह भी बताया कि वह उस समय अपने अभिनय कौशल से पूरी तरह खुश नहीं थीं। उन्हें लग रहा था कि वह कुछ नया सीख नहीं रही हैं और काम करते हुए पहले जैसी खुशी महसूस नहीं कर पा रही हैं। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक ऐसे मौके से हुई, जिसने अभिनय के प्रति उनका नजरिया बदल दिया।
‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ का ऑडिशन बना अहम मोड़
वामिका को फिल्ममेकर विशाल भारद्वाज के प्रोजेक्ट ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ के लिए ऑडिशन देने का मौका मिला। यह सलमान रुश्दी के चर्चित उपन्यास पर आधारित एक प्रोजेक्ट था। वामिका को इस प्रोजेक्ट से काफी उम्मीदें थीं, हालांकि लगातार रिजेक्शन के कारण उन्हें विश्वास नहीं था कि उनका चयन हो पाएगा।
उन्होंने ऑडिशन दिया और इसके बाद उन्हें तीन दिन की एक्टिंग वर्कशॉप में शामिल होने का मौका मिला। यह वर्कशॉप अभिनय कोच अतुल मोंगिया के साथ थी। वामिका के मुताबिक, इन तीन दिनों ने उनके सोचने का तरीका बदल दिया।
वर्कशॉप के दौरान उन्हें समझ आया कि अभिनय सिर्फ किसी किरदार की नकल करने या संवाद बोलने का नाम नहीं है। अपने भीतर की भावनाओं को समझना, खुद को स्वीकार करना और किरदार की परिस्थितियों को महसूस करना भी अभिनय का हिस्सा है।
वामिका ने बाद में बताया कि इस अनुभव ने उन्हें अपनी कला से दोबारा जुड़ने में मदद की। उन्हें महसूस हुआ कि अभिनय में सीखने के लिए बहुत कुछ है और वह इस प्रक्रिया का आनंद ले सकती हैं। जिस पेशे को वह छोड़ने के बारे में सोच रही थीं, उसी में उन्हें फिर से दिलचस्पी महसूस होने लगी।
प्रोजेक्ट मिला, लेकिन ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ बंद हो गया
वर्कशॉप के बाद वामिका को ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ में काम करने का अवसर मिला। लेकिन कहानी में एक बड़ा मोड़ आया। प्रोडक्शन शुरू होने से पहले ही प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया। इस तरह वामिका के हाथ से एक अहम मौका निकल गया।
किसी कलाकार के लिए किसी बड़े प्रोजेक्ट में चयनित होना बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उस प्रोजेक्ट का बन ही न पाना निराशाजनक होता है। खासकर तब, जब कलाकार उस भूमिका के लिए तैयारी कर रहा हो और दूसरे कामों को भी उसी हिसाब से व्यवस्थित कर चुका हो।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, वामिका ने इस प्रोजेक्ट के लिए काफी समय निर्धारित किया था और दूसरे अवसरों को भी छोड़ दिया था। प्रोजेक्ट बंद होने के बाद उनके सामने फिर से अनिश्चितता थी। हालांकि, बाद के वर्षों में उन्हें कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स मिले और उनका करियर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
यह अनुभव इस बात का उदाहरण भी है कि मनोरंजन उद्योग में हर बार किसी प्रोजेक्ट का बंद होना कलाकार की प्रतिभा या मेहनत का परिणाम नहीं होता। कई बार प्रोडक्शन से जुड़े फैसले, बजट और अन्य परिस्थितियां किसी प्रोजेक्ट को आगे बढ़ने से रोक सकती हैं।
‘बाहुबली: बिफोर द बिगिनिंग’ भी नहीं बन पाया
वामिका के करियर से जुड़े दूसरे बड़े प्रोजेक्ट के तौर पर ‘बाहुबली: बिफोर द बिगिनिंग’ का नाम भी रिपोर्टों में सामने आया है। यह ‘बाहुबली’ की दुनिया से जुड़ा प्रस्तावित प्रोजेक्ट था, जिसे लेकर दर्शकों में उत्सुकता थी। लेकिन यह प्रोजेक्ट भी दर्शकों तक उस रूप में नहीं पहुंच पाया, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
जब किसी कलाकार के सामने बड़े अवसर आते हैं और फिर वे आगे नहीं बढ़ पाते, तो करियर की गति प्रभावित हो सकती है। वामिका के लिए भी ऐसे अनुभव निराशाजनक रहे होंगे। लेकिन उन्होंने अपने काम को जारी रखा और विभिन्न फिल्मों तथा वेब सीरीज में भूमिकाएं निभाती रहीं।
यहां यह समझना जरूरी है कि किसी प्रोजेक्ट का बंद होना और किसी कलाकार का करियर समाप्त होना एक बात नहीं है। वामिका की यात्रा में भी कुछ मौके छूटे, लेकिन बाद में दूसरे अवसरों ने उन्हें नई पहचान दी।
‘ग्रहन’ से मिला भरोसा, ‘माई’ ने दिखाई अलग छवि
‘जुबली’ से पहले भी वामिका ने ऐसे किरदार निभाए, जिन्होंने उनके अभिनय की विविधता को सामने रखा। वेब सीरीज ‘ग्रहन’ में उनके काम को सराहना मिली। वामिका ने कई इंटरव्यू में इस प्रोजेक्ट को अपने करियर के महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना है।
इसके बाद ‘माई’ जैसी सीरीज में उनका काम दर्शकों तक पहुंचा। इन प्रोजेक्ट्स में उन्हें ऐसे किरदार मिले जिनमें भावनात्मक गहराई और अलग-अलग परिस्थितियों को समझने की जरूरत थी। धीरे-धीरे उनकी पहचान सिर्फ किसी एक तरह के रोल तक सीमित नहीं रही।
वामिका के लिए महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्हें ऐसे किरदार मिलने लगे जिनमें अभिनय की गुंजाइश थी। वह अलग-अलग व्यक्तित्वों को समझने और उन्हें स्क्रीन पर उतारने का अवसर तलाश रही थीं। यही बदलाव उनके करियर में आगे चलकर काफी अहम साबित हुआ।
‘जुबली’ में नीलोफर ने बदली तस्वीर
साल 2023 में रिलीज हुई विक्रमादित्य मोटवानी की वेब सीरीज ‘जुबली’ वामिका गब्बी के करियर का बड़ा पड़ाव बनी। इस सीरीज में उन्होंने नीलोफर का किरदार निभाया। कहानी फिल्म उद्योग के शुरुआती दौर की दुनिया, महत्वाकांक्षाओं, रिश्तों और पहचान के इर्द-गिर्द घूमती है।
नीलोफर एक जटिल किरदार है। उसमें सपने हैं, महत्वाकांक्षा है, भावनाएं हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने की इच्छा भी है। वामिका ने इस किरदार को केवल एक ही नजरिए से पेश करने के बजाय उसकी अलग-अलग परतों को दिखाने की कोशिश की।
उनकी परफॉर्मेंस को दर्शकों और कई फिल्म समीक्षकों से सराहना मिली। ‘जुबली’ ने उन्हें हिंदी मनोरंजन जगत में अधिक व्यापक पहचान दिलाई। लंबे समय तक संघर्ष करने के बाद यह वह दौर था जब दर्शक उनके नाम और अभिनय पर खास ध्यान देने लगे।
वामिका ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ‘ग्रहन’ ने उनके लिए बदलाव की शुरुआत की थी, जबकि ‘जुबली’ ने उनके करियर को अगले स्तर पर पहुंचाया। यह अंतर बताता है कि किसी कलाकार को पहचान दिलाने वाला प्रोजेक्ट अक्सर अचानक सामने आता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे वर्षों का अनुभव और तैयारी होती है।
‘जुबली’ के बाद लगातार मिले बड़े अवसर
‘जुबली’ के बाद वामिका कई अन्य चर्चित प्रोजेक्ट्स में नजर आईं। इनमें विशाल भारद्वाज की ‘खुफिया’ और ‘चार्ली चोपड़ा एंड द मिस्ट्री ऑफ सोलांग वैली’ जैसे प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। इन कामों ने उन्हें अलग-अलग तरह के किरदार निभाने का मौका दिया।
‘खुफिया’ में उन्होंने तब्बू जैसे अनुभवी कलाकारों के साथ काम किया। वहीं ‘चार्ली चोपड़ा’ में उन्होंने एक रहस्यपूर्ण कहानी के केंद्र में मौजूद किरदार निभाया। इन भूमिकाओं से यह साफ हुआ कि वह केवल एक तरह के रोल तक सीमित नहीं रहना चाहतीं।
वामिका का करियर इस बात का उदाहरण है कि क्षेत्रीय सिनेमा, हिंदी फिल्में और OTT प्लेटफॉर्म कलाकारों को अलग-अलग रास्ते दे सकते हैं। किसी एक माध्यम में पहचान मिलने का इंतजार करने के बजाय विविध प्रोजेक्ट्स में काम करना भी कलाकार के अनुभव और दर्शकों तक पहुंच को बढ़ा सकता है।
रिजेक्शन से सीखने की बात करती हैं वामिका
वामिका ने अपने इंटरव्यू में बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि रिजेक्शन को पूरी जिंदगी की असफलता नहीं मानना चाहिए। उनका मानना है कि कलाकार को अपने काम में लगातार सुधार करना पड़ता है। केवल अवसर मिलने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है; अपने हुनर को बेहतर बनाना भी जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा है कि अभिनय उनके जीवन का एक हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं। इस सोच ने उन्हें करियर के उतार-चढ़ाव को अधिक संतुलित तरीके से देखने में मदद की। पहले जहां वह रिजेक्शन को लेकर बहुत परेशान हो जाती थीं, वहीं बाद में उन्होंने अपने काम और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।
उनकी कहानी से यह भी सीख मिलती है कि कभी-कभी किसी अवसर का न मिलना या किसी प्रोजेक्ट का बंद हो जाना आगे के रास्ते को पूरी तरह बंद नहीं करता। ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ नहीं बन पाया, लेकिन उस प्रोजेक्ट की तैयारी और वर्कशॉप ने वामिका को अभिनय के प्रति नया दृष्टिकोण दिया।
सनी देओल की सूर्या विवादों में, IMA ने सरकार को लिखा पत्र
http://अभिनेत्री वामिका गब्बी की तस्वीर, जुबली वेब सीरीज में नीलोफर का किरदार निभाया

