1980 के दशक में पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के कथित समर्थन को लेकर भारत के सामने बड़ी सुरक्षा चुनौती थी। इसी दौर से जुड़ी एक कहानी में भारतीय खुफिया एजेंसी RAW के एक गुप्त अभियान ‘ऑपरेशन हॉर्नेट’ का जिक्र मिलता है। इस कहानी में यूरोप से लेकर अमेरिका और पाकिस्तान तक फैले एक कथित नेटवर्क की निगरानी, उसके वित्तीय स्रोतों की तलाश और उसके प्रमुख लोगों तक पहुंचने की कोशिश का वर्णन किया गया है। इसी सिलसिले में एक ऑपरेशन ऐसा भी बताया जाता है जिसमें भारतीय एजेंटों ने प्रेमी-प्रेमिका की पहचान बनाकर एक संदिग्ध नेटवर्क में प्रवेश किया और बाद में लाहौर में ISI से जुड़े एक व्यक्ति को निशाना बनाया। यह कहानी एक प्रकाशित रिपोर्ट में दावों और नाटकीय पुनर्निर्माण के रूप में सामने आई है; इसके सभी परिचालन विवरण स्वतंत्र रूप से सार्वजनिक सरकारी रिकॉर्ड से सत्यापित नहीं हैं।
पार्ट-2 की कहानी उस समय से आगे बढ़ती है जब भारतीय एजेंसियां कथित तौर पर खालिस्तानी नेटवर्क के विदेशी संपर्कों और पाकिस्तान से जुड़े लोगों की गतिविधियों पर नजर रख रही थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस नेटवर्क से जुड़े लोगों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए RAW ने यूरोप में अपने सूत्र सक्रिय किए। मकसद केवल किसी एक व्यक्ति तक पहुंचना नहीं था, बल्कि उस पूरे नेटवर्क की फंडिंग, संपर्क और पाकिस्तान में बैठे handlers तक पहुंचना बताया गया।
रिपोर्ट के अनुसार इस मिशन में पेरिस से संजीव जिंदल और दिल्ली से अनुज भारद्वाज जैसे अधिकारियों की भूमिका बताई गई है। कहानी में इन्हें ऐसे अधिकारियों के रूप में पेश किया गया है जो अलग-अलग देशों में मौजूद नेटवर्क के बारे में जानकारी जुटा रहे थे। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि संदिग्ध लोग सीधे भारत में मौजूद नहीं थे। वे यूरोप, ब्रिटेन और पाकिस्तान के बीच अलग-अलग पहचान और संपर्कों के जरिए काम कर रहे थे।
कहानी में एक महत्वपूर्ण कड़ी लंदन से सामने आती है। वहां RAW के एक सूत्र को कथित तौर पर अब्दुल खान के घरेलू स्टाफ से संपर्क मिला। इस संपर्क के जरिए बैंक खातों और पैसे के लेन-देन से जुड़ी जानकारी हासिल होने की बात कही गई। रिपोर्ट के अनुसार कुछ रकम अलग-अलग नामों वाले खातों में जमा की जा रही थी और उनका संबंध कथित तौर पर संधू और हरबख्श जैसे लोगों से बताया गया।
जासूसी अभियानों में वित्तीय लेन-देन अक्सर महत्वपूर्ण सुराग बन सकते हैं। किसी नेटवर्क के हथियारों, भर्ती या प्रचार के पीछे पैसा कहां से आता है, यह पता चलने पर उसके बड़े हिस्से तक पहुंच बनाई जा सकती है। इस कहानी में भी बैंकिंग रिकॉर्ड को उसी तरह का सुराग बताया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, RAW ने इन दस्तावेजों को केवल अपने पास नहीं रखा, बल्कि ब्रिटिश अधिकारियों और कुछ पश्चिमी देशों के राजनयिकों के सामने भी रखने की कोशिश की। मकसद कथित ISI-linked नेटवर्क पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना था। लेकिन कहानी के अनुसार कार्रवाई होने से पहले ही नेटवर्क से जुड़ा एक प्रमुख व्यक्ति लंदन छोड़कर पाकिस्तान पहुंच गया।
यहीं से मिशन और जटिल हो गया। अगर कोई संदिग्ध व्यक्ति किसी दूसरे देश में चला जाए तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना और उसके संपर्कों को ट्रैक करना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। कहानी के मुताबिक भारतीय एजेंटों ने इसके बाद अपने दूसरे स्रोतों को सक्रिय किया और पता लगाया कि संबंधित व्यक्ति इस्लामाबाद पहुंच चुका है।
इसी बीच कहानी में एक अन्य किरदार सोफी की एंट्री होती है। रिपोर्ट उसे RAW के लिए काम करने वाली महिला के रूप में प्रस्तुत करती है। सोफी का इस्तेमाल ऐसे नेटवर्क तक पहुंच बनाने के लिए किया गया, जहां सीधे किसी भारतीय अधिकारी की मौजूदगी शक पैदा कर सकती थी।
कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यहीं से शुरू होता है। अमेरिका में मौजूद एक कारोबारी अवतार सेठी पर कथित तौर पर नजर थी। उस पर खालिस्तानी नेटवर्क और विदेशी संपर्कों को आर्थिक सहायता देने के आरोपों की जांच का जिक्र किया गया है। RAW को कथित तौर पर लगा कि उसके आसपास पहुंच बनाकर नेटवर्क की महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की जा सकती है।
इसके लिए सोफी और आहूजा को प्रेमी-प्रेमिका बनकर अमेरिका पहुंचने की कहानी सामने आती है। आहूजा को कथित तौर पर सेठी के पुराने नेटवर्क में वापस पहुंचाया गया, जबकि सोफी ने उसके साथ निजी और पेशेवर दोनों स्तरों पर संपर्क बनाया। इस cover identity के जरिए दोनों ने कथित तौर पर सेठी के कार्यालय और निजी संपर्कों तक पहुंच हासिल की।
यहां undercover intelligence की मूल रणनीति समझना जरूरी है। किसी संवेदनशील नेटवर्क में सीधे एजेंट भेजना अक्सर जोखिम भरा होता है। इसलिए एजेंट को ऐसी पहचान दी जाती है जिसके जरिए वह उस नेटवर्क का स्वाभाविक हिस्सा दिखाई दे। इस मामले में प्रकाशित कहानी का दावा है कि प्रेमी-प्रेमिका की पहचान उसी cover का हिस्सा थी।
रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी 1986 तक सोफी और आहूजा ने बैंक खातों, कथित ISI बैठकों और हथियारों की सप्लाई से जुड़े दस्तावेज हासिल कर लिए थे। ये दस्तावेज आगे की कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण बताए गए। इसके बाद दोनों कथित तौर पर पेरिस लौट आए।
इसके बाद कहानी में सेठी से पूछताछ का दौर आता है। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय अधिकारियों ने उसे उसके कथित वित्तीय नेटवर्क और दूसरे संपर्कों से जुड़े दस्तावेज दिखाए। दबाव बढ़ने के बाद उसने कथित तौर पर यूरोप में चल रहे नेटवर्क के बारे में जानकारी दी।
कहानी के अनुसार सेठी ने दावा किया कि लंदन स्थित पाकिस्तानी दूतावास के भीतर कुछ अधिकारी कथित रूप से ISI नेटवर्क चला रहे थे। उसने कथित तौर पर भारत में सक्रिय कुछ लोगों के नाम भी बताए। इसके बाद RAW और पंजाब पुलिस द्वारा कार्रवाई किए जाने का जिक्र रिपोर्ट में मिलता है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रकाशित कहानी में बताए गए व्यक्तियों, संख्याओं और गुप्त अभियानों का पूरा स्वतंत्र दस्तावेजी सत्यापन सार्वजनिक स्रोतों में आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें ऐतिहासिक रूप से सिद्ध तथ्य के बजाय रिपोर्ट में वर्णित दावे के रूप में देखना चाहिए।
कहानी में आगे बताया गया है कि सेठी ने एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध कराई, जिसमें अब्दुल खान और संधू द्वारा भारत में बड़े हमलों की योजना बनाने की बात कही गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक यह जानकारी ब्रिटिश इंटेलिजेंस तक पहुंचाई गई। इसके बाद ब्रिटेन में पाकिस्तानी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई है।
इसी दौरान कहानी में एक और महत्वपूर्ण स्रोत सामने आता है—बलवंत। रिपोर्ट के अनुसार वह नेटवर्क से जुड़ा एक व्यक्ति था जो बाद में इस गतिविधि से बाहर निकलना चाहता था। उसने कथित तौर पर भारतीय एजेंटों को नेटवर्क की अंदरूनी जानकारी देने की पेशकश की।
जासूसी की दुनिया में ऐसे sources बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। किसी संगठन के अंदर मौजूद व्यक्ति को यह पता होता है कि निर्णय कौन लेता है, पैसे कहां जाते हैं और किससे किसका संपर्क है। लेकिन ऐसे स्रोतों पर भरोसा करना भी जोखिम भरा होता है, क्योंकि उनकी जानकारी की सत्यता जांचना जरूरी होता है।
कहानी के अनुसार बलवंत से मिली जानकारी के आधार पर ब्रिटिश पुलिस ने लंदन में कार्रवाई की और संधू सहित उसके कुछ सहयोगियों की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा कमजोर होने का दावा किया गया है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। रिपोर्ट के अनुसार अब्दुल खान गिरफ्तारी से बच गया था और उसने कथित तौर पर अपना नेटवर्क दोबारा खड़ा करने की कोशिश की। इसी दौरान RAW को उसके पाकिस्तान जाने की जानकारी मिलने का दावा किया गया।
यह जानकारी फिर उसी पुराने स्रोत से जुड़ी बताई गई है—अब्दुल खान का माली तारिक। कहानी में बताया गया है कि तारिक ने भारतीय एजेंटों को सूचना दी कि अब्दुल खान पाकिस्तान जाने वाला है और वहां ISI के वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने की योजना बना रहा है।
यहीं से मिशन का सबसे खतरनाक चरण शुरू होता है। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय अधिकारियों के सामने सवाल था कि क्या अब्दुल खान को पाकिस्तान के अंदर जाकर निशाना बनाया जाए। किसी विदेशी देश की जमीन पर ऐसा अभियान बेहद जोखिम भरा होता है, क्योंकि अगर एजेंट पकड़े जाते तो मामला सीधे अंतरराष्ट्रीय विवाद में बदल सकता था।
कहानी के अनुसार इस कार्रवाई के लिए उच्च स्तर की मंजूरी की जरूरत थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि संजीव जिंदल ने अनुज भारद्वाज को पूरी योजना बताई। इसके बाद कथित तौर पर उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति मिली।
इसके बाद जून 1987 का लाहौर वाला दृश्य कहानी का सबसे नाटकीय हिस्सा बन जाता है। रिपोर्ट के अनुसार अब्दुल खान लाहौर पहुंचा। उसे कथित तौर पर एक सुरक्षित ठिकाने पर जाना था, जहां से वह आगे की बैठक के लिए निकलने वाला था।
कहानी के मुताबिक वह टैक्सी से उतरा और एक घर की ओर गया। वह दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था तभी मोटरसाइकिल पर दो लोग वहां पहुंचे। दोनों ने अपने चेहरे ढके हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार पीछे बैठे हमलावर ने पिस्टल निकाली और गोली चला दी।
प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसके बाद अब्दुल खान पर कुल नौ गोलियां चलाई गईं और उसकी मौत हो गई। हमलावर मोटरसाइकिल से वहां से निकल गए और उनकी पहचान सार्वजनिक नहीं हुई। कहानी उन्हें भारतीय खुफिया एजेंसी RAW के undercover agents के रूप में प्रस्तुत करती है।
हालांकि इस दावे को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सावधानी यही है कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्वतंत्र आधिकारिक रिकॉर्ड में इस कथित ऑपरेशन की पूरी पुष्टि आसानी से नहीं मिलती। इसलिए यह कहना कि “RAW ने निश्चित रूप से लाहौर में अब्दुल खान को मार गिराया” एक स्थापित तथ्य के रूप में उचित नहीं होगा। इसे उस प्रकाशित रिपोर्ट के दावे के रूप में ही प्रस्तुत करना बेहतर है।
इस कहानी का संदर्भ 1980 के दशक के पंजाब में उग्रवाद के दौर से जुड़ा है। उस समय भारत में खालिस्तान समर्थक हिंसा गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुकी थी और पाकिस्तान से कथित समर्थन तथा सीमा पार नेटवर्क को लेकर भारतीय एजेंसियां चिंतित थीं। इसी व्यापक संदर्भ में RAW, पंजाब पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों की कहानियां सामने आती रही हैं।
इस दौर की एक बड़ी घटना संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की हत्या भी थी। जुलाई 1985 में राजीव गांधी और लोंगोवाल के बीच पंजाब समझौता हुआ था, लेकिन अगस्त 1985 में लोंगोवाल की हत्या कर दी गई। यह घटना पंजाब में शांति प्रक्रिया के लिए बड़ा झटका बनी। प्रकाशित ऑपरेशन हॉर्नेट कहानी इसी अशांत दौर को अपनी पृष्ठभूमि बनाती है।
यह समझना भी जरूरी है कि खालिस्तानी उग्रवाद और ISI की भूमिका को लेकर ऐतिहासिक घटनाओं में कई अलग-अलग स्रोत, आरोप और जांच सामने आए हैं। इसलिए किसी एक narrative में बताए गए हर operational detail को अंतिम ऐतिहासिक सत्य मानना उचित नहीं है।
फिर भी इस कहानी में एक चीज खास तौर पर ध्यान खींचती है—undercover identities का इस्तेमाल। प्रेमी-प्रेमिका की पहचान बनाकर किसी नेटवर्क में प्रवेश करने का दावा इस कहानी को सामान्य intelligence operation से अलग बनाता है।
जासूसी की दुनिया में cover identity का उद्देश्य यही होता है कि एजेंट अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर किसी लक्ष्य तक पहुंच सके। लेकिन वास्तविक intelligence operations के बारे में सार्वजनिक जानकारी अक्सर सीमित होती है। इसलिए फिल्मों और रिपोर्टों में दिखाए जाने वाले dramatic scenes और वास्तविक operations में अंतर हो सकता है।
इस कहानी में सोफी की भूमिका भी इसी वजह से महत्वपूर्ण बनती है। रिपोर्ट के अनुसार उसने अपने सामाजिक संपर्क और व्यक्तिगत पहचान का इस्तेमाल करके संदिग्ध नेटवर्क तक पहुंच बनाई। इस तरह महिला एजेंट की भूमिका सिर्फ सहायक की नहीं, बल्कि कथित infiltration strategy के केंद्र में थी।
आहूजा के साथ उसकी cover identity ने उसे कारोबारी नेटवर्क के करीब पहुंचने का मौका दिया। बैंक खातों और दस्तावेजों तक पहुंच बनाने का दावा इसी undercover operation का परिणाम बताया गया है। अगर रिपोर्ट में वर्णित घटनाएं सही मानी जाएं तो इस चरण ने आगे के पूरे ऑपरेशन को दिशा दी।
इसके बाद सेठी से मिली जानकारी कथित तौर पर और बड़ी तस्वीर सामने लाती है। नेटवर्क केवल एक शहर या एक देश तक सीमित नहीं था। लंदन, अमेरिका, यूरोप और पाकिस्तान के बीच संपर्क होने का दावा किया गया। भारत में मौजूद लोगों को धन और हथियार पहुंचाने की बात भी कहानी में कही गई है।
इस तरह ऑपरेशन हॉर्नेट की कहानी को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है—पहला, नेटवर्क की पहचान, दूसरा, उसके वित्तीय और मानवीय स्रोतों तक पहुंच, और तीसरा, सबसे बड़े कथित handler तक पहुंचने की कोशिश।
पहले चरण में बैंक रिकॉर्ड और स्रोतों की जानकारी सामने आती है। दूसरे चरण में undercover operation के जरिए कथित नेटवर्क के अंदर प्रवेश किया जाता है। तीसरे चरण में पाकिस्तान जाने वाले अब्दुल खान पर नजर रखी जाती है।
लाहौर वाला कथित हमला इसी तीसरे चरण का अंतिम हिस्सा बताया गया है। कहानी के अनुसार भारतीय एजेंटों ने सीमा पार जाकर उसे निशाना बनाया और फिर बिना अपनी पहचान उजागर किए वहां से निकल गए।
लेकिन यही वह हिस्सा है जहां पाठकों को सबसे ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। किसी गुप्त intelligence operation के बारे में यदि official declassified records, court documents या multiple independent historical sources उपलब्ध नहीं हैं, तो उसके operational details को confirmed fact की तरह लिखना उचित नहीं है।
इसलिए इस article में “रिपोर्ट के अनुसार”, “कहानी में दावा किया गया है” और “सार्वजनिक रूप से स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं” जैसे शब्द महत्वपूर्ण हैं। इससे खबर sensational होने के बावजूद factual standard बनाए रखती है।
आज के दौर में जब spy operations पर आधारित कई फिल्में और web series बनती हैं, वास्तविक घटनाओं और fictional storytelling के बीच अंतर करना और भी जरूरी हो गया है। RAW और ISI दोनों ही ऐसी संस्थाएं हैं जिनके वास्तविक operations का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक नहीं होता। इसलिए किसी कथित mission की कहानी को official history मानने से पहले स्रोत देखना चाहिए।
ऑपरेशन हॉर्नेट की यह कहानी फिर भी इसलिए चर्चा में आती है क्योंकि इसमें उस दौर के भारत-पाकिस्तान तनाव, पंजाब में उग्रवाद, विदेशी फंडिंग, undercover agents और cross-border intelligence operations जैसे कई पहलू एक साथ दिखाई देते हैं।
कहानी का सबसे चर्चित हिस्सा वह है जिसमें दो एजेंट कथित तौर पर प्रेमी-प्रेमिका बनकर एक कारोबारी नेटवर्क तक पहुंचते हैं और बाद में उसी नेटवर्क के एक बड़े संपर्क को खत्म करने के लिए लाहौर तक पहुंचते हैं। यह narrative जासूसी की दुनिया के उस पहलू को सामने लाता है जिसमें कई साल तक केवल जानकारी जुटाने के बाद कार्रवाई का फैसला लिया जाता है।
अगर रिपोर्ट में दिए घटनाक्रम को एक timeline की तरह देखें तो कहानी 1985 में यूरोप में नेटवर्क की जानकारी जुटाने से शुरू होती है, 1986 में अमेरिका में undercover operation तक पहुंचती है और 1987 में लाहौर के कथित assassination तक जाती है।
इस दौरान कई देशों का नाम आता है—फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका, पाकिस्तान और भारत। यही इस कथित operation की जटिलता को दिखाता है। एक देश में मिली जानकारी दूसरे देश में बैठे व्यक्ति तक पहुंचती है और फिर उसे तीसरे देश में सत्यापित करने की कोशिश की जाती है।
ऐसे अभियानों में सबसे बड़ी चुनौती होती है कि कोई भी छोटी गलती पूरे नेटवर्क को expose कर सकती है। यदि undercover agent की पहचान खुल जाए तो मिशन ही नहीं, उसकी जान भी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए कहानी में बार-बार source protection और cover identity का उल्लेख किया गया है।
अंत में कहानी उस दावे पर खत्म होती है कि अब्दुल खान लाहौर में मारा गया और उसके बाद भारतीय एजेंट सुरक्षित निकल गए। लेकिन यह दोहराना जरूरी है कि यह विवरण उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्ट का narrative है, न कि ऐसा ऑपरेशन जिसकी हर जानकारी सार्वजनिक सरकारी रिकॉर्ड से स्वतंत्र रूप से प्रमाणित हो चुकी हो।
कुल मिलाकर, ऑपरेशन हॉर्नेट पार्ट-2 की कहानी 1980 के दशक के खालिस्तानी उग्रवाद और पाकिस्तान से जुड़े कथित नेटवर्क के खिलाफ भारतीय खुफिया प्रयासों के इर्द-गिर्द घूमती है। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार RAW ने यूरोप में अपने सूत्रों के जरिए नेटवर्क की जानकारी जुटाई, अमेरिका में सोफी और आहूजा को कथित तौर पर प्रेमी-प्रेमिका बनाकर एक कारोबारी तक पहुंचाया, बैंकिंग और नेटवर्क से जुड़े दस्तावेज हासिल किए और बाद में लंदन तथा पाकिस्तान तक फैले कथित संपर्कों की जानकारी जुटाई। अंत में रिपोर्ट दावा करती है कि जून 1987 में लाहौर में अब्दुल खान को भारतीय undercover agents ने निशाना बनाया और नौ गोलियां मारीं। हालांकि इस आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण दावे सहित ऑपरेशन के कई operational details की स्वतंत्र सार्वजनिक पुष्टि सीमित है। इसलिए इसे एक प्रकाशित investigative narrative के रूप में पढ़ना ज्यादा उचित है, न कि पूरी तरह declassified और आधिकारिक इतिहास के रूप में।
ऑपरेशन कहूटा पार्ट-1: भोपाल में जन्मे AQ Khan ने कैसे हासिल की परमाणु तकनीक, बालों से खुला पाकिस्तान का राज
http://ऑपरेशन हॉर्नेट में कथित RAW अंडरकवर एजेंटों की जासूसी
