सुबह आंख खुलते ही फोन उठाना, Instagram या YouTube खोलना और सिर्फ एक Reel देखने के इरादे से scrolling शुरू करना… फिर देखते-देखते 20 मिनट, 40 मिनट या कभी-कभी एक घंटे से ज्यादा समय निकल जाना। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इस दौरान हमें अक्सर पता ही नहीं चलता कि कितना समय बीत गया।
आज short-video content यानी Reels, Shorts और दूसरे छोटे वीडियो मनोरंजन का आसान साधन बन चुके हैं। लेकिन जब यही आदत पढ़ाई, नौकरी, नींद, परिवार, बातचीत और रोजमर्रा के कामों पर असर डालने लगे तो इसे सामान्य मनोरंजन मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है।
एक आसान हिसाब समझिए। अगर कोई व्यक्ति औसतन रोज 2 घंटे 40 मिनट social-media या short-video scrolling में खर्च करता है, तो एक साल में यह समय लगभग 973 घंटे हो जाता है। यानी करीब 40 दिन। 972 घंटे का आंकड़ा इसी तरह के हिसाब के आसपास बैठता है। लेकिन इसे हर भारतीय या हर Reels user का वास्तविक औसत नहीं माना जाना चाहिए। भारत में social-media usage काफी ज्यादा है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े पूरे social media के हैं, सिर्फ Reels के नहीं। DataReportal के 2025 India report के मुताबिक जनवरी 2025 में भारत में 491 million social-media user identities दर्ज थीं और Instagram की ad reach 414 million थी।
यानी असली सवाल यह नहीं है कि आपने कितनी Reels देखीं। सवाल यह है कि क्या आपका फोन आपके समय और ध्यान को नियंत्रित करने लगा है?
Reels इतनी जल्दी आदत क्यों बन जाती हैं?
Short videos को इस तरह डिजाइन किया गया है कि उपयोगकर्ता एक वीडियो खत्म होते ही अगले वीडियो पर पहुंच जाए। इसके लिए infinite scrolling, autoplay, लगातार नए recommendations और notifications जैसे features इस्तेमाल होते हैं।
AI और recommendation algorithms आपके पिछले व्यवहार को देखकर यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि अगला कौन-सा वीडियो आपको पसंद आएगा। अगर आपने क्रिकेट की कई Reels देखीं तो feed में और क्रिकेट आ सकता है। अगर आपने comedy videos देखे हैं तो वैसे ही वीडियो लगातार सामने आते रहेंगे।
AIIMS की psychiatrist Prof. Mamta Sood ने Indian Express को बताया कि समस्या सिर्फ smartphone होने की नहीं है, बल्कि उसके इस्तेमाल के तरीके की है। उनके मुताबिक बार-बार phone check करना, फोन उपलब्ध न होने पर बेचैनी महसूस करना, लगातार ज्यादा समय देना और यह जानते हुए भी इस्तेमाल जारी रखना कि इससे काम या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है—ये dependence के warning signs हो सकते हैं।
इसमें boredom भी बड़ी भूमिका निभाता है। खाली बैठे हैं तो Reel, खाना खा रहे हैं तो Reel, बस का इंतजार है तो Reel, सोने से पहले Reel और सुबह उठते ही Reel।
धीरे-धीरे दिमाग हर खाली पल को phone से भरने का आदी हो सकता है।
972 घंटे का हिसाब कैसे समझें?
मान लीजिए कोई व्यक्ति रोज 2 घंटे 40 मिनट short videos या social media scrolling में बिताता है।
2 घंटे 40 मिनट = 160 मिनट।
160 मिनट × 365 दिन = 58,400 मिनट।
58,400 मिनट ÷ 60 = लगभग 973 घंटे।
यानी साल में लगभग 40 पूरे दिन।
यह calculation किसी व्यक्ति के actual Reels usage का सर्वे नहीं है। इसका मकसद केवल यह समझाना है कि रोज के 2-3 घंटे देखने में छोटे लग सकते हैं, लेकिन सालभर में वे बहुत बड़ा समय बन जाते हैं।
और यदि आपका actual screen-time इससे कम है, तो भी यह देखना जरूरी है कि उस समय का कितना हिस्सा productive है और कितना automatic scrolling में चला जाता है।
क्या Reels देखना मतलब “नशा” होना है?
नहीं।
हर व्यक्ति जो Reels देखता है, उसे addicted कहना सही नहीं होगा।
Social media का सामान्य इस्तेमाल और problematic use अलग चीजें हैं। WHO के अनुसार problematic social-media use में ऐसे addiction-like symptoms हो सकते हैं जिनमें व्यक्ति usage control नहीं कर पाता, दूसरी activities की जगह social media को प्राथमिकता देता है और उसके कारण daily life में negative consequences आने लगते हैं। WHO Europe की 2022 adolescent survey में 11% adolescents ने problematic social-media behaviour के संकेत दिखाए थे, जो 2018 के 7% से ज्यादा था।
इसलिए “मैं रोज Reel देखता हूं” और “मैं Reel देखना रोक नहीं पा रहा हूं” दोनों को एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए।
पहला सामान्य digital entertainment हो सकता है। दूसरा problematic behaviour का संकेत हो सकता है।
ये 8 सवाल खुद से पूछिए
अगर आप जानना चाहते हैं कि आपकी Reels देखने की आदत सामान्य है या समस्या बन रही है, तो खुद से ये सवाल पूछें।
1. क्या आप फोन सिर्फ 5 मिनट के लिए उठाते हैं लेकिन आधा घंटा निकल जाता है?
2. क्या आप बिना किसी खास कारण बार-बार Instagram या YouTube खोलते हैं?
3. क्या पढ़ाई या काम के बीच बार-बार Reel देखने का मन करता है?
4. क्या रात में सोने का समय सिर्फ scrolling के कारण आगे बढ़ जाता है?
5. क्या आपने screen time कम करने की कोशिश की लेकिन कुछ दिनों बाद फिर पुरानी आदत लौट आई?
6. क्या घरवालों या दोस्तों ने आपके phone use को लेकर शिकायत की है?
7. क्या फोन नहीं मिलने पर बेचैनी या चिड़चिड़ापन महसूस होता है?
8. क्या आपको लगता है कि Reel देखने में समय बर्बाद हो रहा है, फिर भी आप रोक नहीं पाते?
अगर इनमें से कई सवालों का जवाब “हां” है और इसका असर आपकी daily life पर पड़ रहा है, तो अपनी digital habit को गंभीरता से देखना चाहिए।
PGIMER के विशेषज्ञों ने भी Reels addiction को लेकर चिंता जताई
फरवरी 2026 में Indian Express ने PGIMER Chandigarh के psychiatrists के हवाले से internet और reel addiction को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
रिपोर्ट के अनुसार PGIMER के एक अध्ययन में youth में internet addiction की समस्या सामने आई। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि short-video content का लगातार consumption कई युवाओं के लिए समस्या बन रहा है। PGIMER की child and adolescent psychiatry विशेषज्ञों ने smartphones की आसान उपलब्धता, uninterrupted internet, peer pressure और adolescence की emotional vulnerability को महत्वपूर्ण factors बताया।
विशेषज्ञों के मुताबिक Reels instant gratification देती हैं। छोटा video खत्म होते ही दूसरा शुरू हो जाता है। इससे user को बार-बार नया stimulus मिलता रहता है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर Reel देखने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार है। समस्या तब महत्वपूर्ण होती है जब व्यक्ति usage पर control खोने लगे और इसका असर उसकी जिंदगी पर दिखाई देने लगे।
Reels की लत छुड़ाने का पहला तरीका: अचानक फोन बंद मत करें
बहुत लोग एक दिन फैसला करते हैं कि अब Instagram, YouTube और बाकी social media बिल्कुल बंद।
कुछ घंटे या दो दिन तक सब ठीक चलता है। फिर boredom आता है और व्यक्ति वापस पुराने pattern में चला जाता है।
AIIMS psychiatrist Prof. Mamta Sood के अनुसार screen-time कम करने के लिए technology पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है। उनका सुझाव है कि एक-दो छोटे बदलावों से शुरुआत करें और उन्हें लगातार follow करें।
इसलिए पहले दिन से 5 घंटे की scrolling को zero करने के बजाय धीरे-धीरे कम करना ज्यादा practical हो सकता है।
दूसरा तरीका: फोन खोलने से पहले कारण तय करें
यह बहुत आसान लेकिन असरदार तरीका है।
फोन unlock करने से पहले खुद से पूछें:
“मैं फोन क्यों खोल रहा हूं?”
अगर जवाब है—किसी को call करना है, message भेजना है, payment करनी है या कोई जरूरी information देखनी है—तो वही काम पूरा करें।
काम खत्म होने के बाद phone रख दें।
अगर कोई उद्देश्य नहीं है और सिर्फ आदत के कारण फोन खोला है, तो वापस रख देने की कोशिश करें।
AIIMS psychiatrist ने भी phone को purpose के साथ इस्तेमाल करने की सलाह दी है।
तीसरा तरीका: Notifications बंद करें
हर notification आपके दिमाग को फिर phone की तरफ खींच सकती है।
Instagram likes, random recommendations, promotional alerts और दूसरी non-essential notifications बंद की जा सकती हैं।
इससे phone आपको बुलाने के बजाय आप तय करेंगे कि phone कब इस्तेमाल करना है।
आप social-media apps को home screen से हटाकर किसी दूसरे folder में भी रख सकते हैं। इससे automatic tapping की संभावना कम हो सकती है।
चौथा तरीका: Instagram और YouTube को सामने मत रखिए
जिस app को आप सबसे ज्यादा खोलते हैं, उसे home screen से हटा दें।
जरूरत हो तो social-media apps को uninstall करके कुछ समय browser या laptop से इस्तेमाल करें।
यह तरीका इसलिए काम कर सकता है क्योंकि automatic behaviour के बीच एक छोटा सा barrier बन जाता है।
AIIMS की Prof. Mamta Sood ने भी distracting apps को home screen से हटाने और जरूरत पड़ने पर social-media apps को phone से हटाकर laptop से access करने जैसे छोटे बदलाव सुझाए हैं।
पांचवां तरीका: सुबह उठने के बाद 15-20 मिनट No Phone
सुबह उठते ही phone देखने की आदत बहुत लोगों में होती है।
Alarm बंद किया और सीधे notifications देखने लगे।
इसके बजाय कोशिश करें कि सुबह के शुरुआती 15-20 मिनट screen-free रहें।
इस दौरान पानी पी सकते हैं, थोड़ा stretching कर सकते हैं, नहा सकते हैं, newspaper पढ़ सकते हैं या शांत बैठ सकते हैं।
Prof. Mamta Sood ने भी सुबह के शुरुआती 15-20 मिनट screen-free रखने और दिन में कुछ analogue activities वापस लाने की सलाह दी है।
छठा तरीका: रात में Reels को सबसे पहले बंद करें
Reels की सबसे खतरनाक आदतों में से एक है bedtime scrolling।
आप सोचते हैं कि सिर्फ एक Reel देखेंगे।
फिर एक video के बाद दूसरा।
फिर तीसरा।
फिर algorithm कोई interesting video दिखाता है।
और अचानक 30-60 मिनट निकल जाते हैं।
Late-night phone use sleep schedule को बिगाड़ सकता है। AIIMS psychiatrist ने bedtime से पहले phone use कम करने और bedroom को ज्यादा से ज्यादा phone-free रखने की सलाह दी है।
इसलिए सोने से पहले phone को bed से दूर रखने की कोशिश करें।
सातवां तरीका: Reels की जगह replacement activity रखें
सिर्फ phone हटाना काफी नहीं है।
अगर खाली समय में करने के लिए कुछ नहीं होगा तो दिमाग वापस phone की तरफ जाएगा।
इसलिए पहले से alternatives तैयार रखें।
जैसे:
- 20-30 मिनट walking
- किताब पढ़ना
- exercise
- drawing
- music
- gardening
- cooking
- दोस्तों या परिवार से बातचीत
- outdoor games
- कोई skill सीखना
- पढ़ाई का छोटा target
AIIMS की guidance भी यही बताती है कि digital detox के दौरान screen-time को किसी meaningful offline activity से replace करना जरूरी है।
आठवां तरीका: Grayscale mode इस्तेमाल करें
अगर आपके smartphone में grayscale option है तो उसे try कर सकते हैं।
Colorful icons और thumbnails कई लोगों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकते हैं। Black-and-white display phone को थोड़ा कम stimulating बना सकता है।
यह कोई medical treatment नहीं है, लेकिन distracting phone use को कम करने के लिए एक practical experiment हो सकता है।
नौवां तरीका: App timer लगाइए
Android और iPhone दोनों में screen-time monitoring और app-limit जैसे features उपलब्ध हैं।
सबसे पहले अपना actual usage देखें।
मान लीजिए आपको पता चला कि Instagram पर रोज 2 घंटे जा रहे हैं।
तुरंत 10 मिनट की limit लगाने के बजाय realistic target बनाइए।
पहला सप्ताह: 90 मिनट।
फिर: 60 मिनट।
फिर जरूरत के हिसाब से और कम।
लेकिन अगर social media आपका काम है—जैसे content creator, business या news page—तो सिर्फ total time देखकर फैसला न करें। Work-related और entertainment use को अलग-अलग track करना ज्यादा उपयोगी होगा।
दसवां तरीका: “बस एक Reel” वाले trap को पहचानिए
Reels का सबसे बड़ा trap यही है कि हर video छोटा होता है।
आपको लगता है:
“बस एक Reel और।”
लेकिन एक Reel के बाद दूसरा automatically सामने आता है।
इसलिए लक्ष्य “एक Reel” नहीं बल्कि एक तय समय होना चाहिए।
उदाहरण के लिए:
“मैं शाम 7:30 से 8 बजे तक social media देखूंगा।”
समय खत्म होने के बाद app बंद।
इससे आपका control algorithm के बजाय आपके हाथ में रहता है।
क्या Reels से ध्यान लगाने की क्षमता कम होती है?
इस सवाल का जवाब पूरी तरह black-and-white नहीं है।
Research में problematic social-media use और attention-related problems के बीच associations मिली हैं, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि हर social-media use सीधे attention disorder पैदा करता है।
2026 की एक systematic review में adolescents में social-media use और inattention/impulsivity के बीच सकारात्मक संबंधों की रिपोर्ट मिली, लेकिन researchers ने studies के बीच काफी heterogeneity और causal inference की सीमाओं पर भी जोर दिया।
इसलिए “Reels देखने से brain damage हो जाता है” जैसे claims से बचना चाहिए।
सही बात यह है कि बहुत ज्यादा और uncontrolled digital use आपकी attention, sleep, productivity और daily routine को प्रभावित कर सकता है, खासकर जब वह दूसरी जरूरी activities को replace करने लगे।
क्या Reels depression या anxiety का कारण बनती हैं?
यहां भी सावधानी जरूरी है।
एक systematic review और meta-analysis में problematic social-media use का depression, anxiety और stress के साथ statistically significant association पाया गया। लेकिन association का मतलब यह नहीं है कि social media अकेला इन समस्याओं का कारण है।
WHO भी digital environments के mental-health effects को complex और दोतरफा मानता है। यानी ज्यादा screen/social-media use मानसिक परेशानी से जुड़ सकता है, लेकिन दूसरी तरफ stress, loneliness या anxiety से जूझ रहा व्यक्ति भी ज्यादा phone use करने लग सकता है।
इसलिए किसी व्यक्ति को सिर्फ उसके screen time देखकर मानसिक बीमारी का label नहीं देना चाहिए।
एक आसान 7-दिन का Reels Control Plan
अगर आपको लगता है कि आपकी Reels देखने की आदत जरूरत से ज्यादा हो गई है तो अगले 7 दिन यह routine आजमा सकते हैं।
Day 1: अपना actual screen time check करें।
Day 2: Instagram/YouTube की non-essential notifications बंद करें।
Day 3: सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली app को home screen से हटाएं।
Day 4: सुबह उठने के बाद 20 मिनट phone-free रहें।
Day 5: खाने के दौरान phone अलग रखें।
Day 6: सोने से कम से कम 60-120 मिनट पहले scrolling बंद करने की कोशिश करें।
Day 7: पूरे सप्ताह का screen-time देखें और compare करें कि कितना समय कम हुआ।
यह कोई medical treatment नहीं है। इसका उद्देश्य habit को पहचानना और धीरे-धीरे control वापस लेना है।
कब विशेषज्ञ से मदद लेनी चाहिए?
अगर आप बार-बार कोशिश करने के बाद भी social media या Reels का इस्तेमाल नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं और इसका असर आपकी पढ़ाई, नौकरी, नींद, रिश्तों या daily responsibilities पर पड़ रहा है, तो mental-health professional से बात करना बेहतर हो सकता है।
खासकर अगर phone न मिलने पर बहुत ज्यादा बेचैनी, चिड़चिड़ापन, लगातार नींद की समस्या या कामकाज में गंभीर गिरावट हो रही हो, तो इसे केवल “मेरी आदत खराब है” कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
मदद लेने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति “पागल” है। Behavioural habits को समझना और जरूरत पड़ने पर professional support लेना सामान्य healthcare का हिस्सा है।
आखिर में सबसे जरूरी बात
Reels खुद दुश्मन नहीं हैं।
उनसे entertainment मिलता है, information मिल सकती है, नए ideas मिल सकते हैं और creators के लिए income का जरिया भी हो सकता है।
समस्या तब शुरू होती है जब आप Reel देखने का फैसला नहीं करते, बल्कि Reel आपको बार-बार देखने के लिए खींचती रहती है।
इसलिए आज अपने phone का Screen Time खोलिए और सिर्फ एक सवाल पूछिए—
“मैंने आज phone का इस्तेमाल किया है या phone ने मेरा समय इस्तेमाल किया है?”
अगर रोज के कुछ मिनट मनोरंजन के लिए जाते हैं तो चिंता की बात नहीं। लेकिन अगर रोज के घंटे बिना पता चले निकल रहे हैं और पढ़ाई, काम, नींद या रिश्ते पीछे छूट रहे हैं, तो बदलाव शुरू करने का समय है।
याद रखिए—digital detox का मतलब smartphone छोड़ना नहीं है। इसका मतलब है smartphone को अपनी जिंदगी का tool बनाना, अपनी जिंदगी का मालिक नहीं।

