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खाने से बचना बच्चों में ईटिंग डिसऑर्डर का संकेत, 17% बच्चे जोखिम में

आज के समय में बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी कई नई चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। इन्हीं में से एक गंभीर समस्या है ईटिंग डिसऑर्डर, यानी खाने से बचना या खाने की आदतों में असामान्य बदलाव। विशेषज्ञों के अनुसार यदि बच्चा लगातार खाने से बचता है, बहुत कम खाना खाता है या खाने को लेकर अत्यधिक चिंता दिखाता है, तो यह केवल सामान्य जिद नहीं बल्कि एक मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि आज के दौर में बच्चों और किशोरों में ईटिंग डिसऑर्डर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कई अध्ययनों के अनुसार भारत में भी लगभग 17 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी प्रकार के ईटिंग डिसऑर्डर के जोखिम में पाए गए हैं।

ईटिंग डिसऑर्डर केवल खाने की आदतों से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी होती है।

जब बच्चे अपने शरीर को लेकर अत्यधिक चिंतित होने लगते हैं या वजन बढ़ने के डर से भोजन से दूरी बनाने लगते हैं, तो यह स्थिति धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है।

कई बार बच्चे समाज, सोशल मीडिया या दोस्तों के दबाव में आकर अपने शरीर को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।

ऐसे में वे खाना कम कर देते हैं या कुछ विशेष प्रकार के भोजन से पूरी तरह बचने लगते हैं।

समय के साथ यह आदत ईटिंग डिसऑर्डर में बदल सकती है।

डॉक्टरों के अनुसार बच्चों में ईटिंग डिसऑर्डर के कई प्रकार होते हैं।

इनमें एनोरेक्सिया नर्वोसा, बुलिमिया नर्वोसा और बिंज ईटिंग डिसऑर्डर जैसे प्रमुख प्रकार शामिल हैं।

एनोरेक्सिया में बच्चा वजन बढ़ने के डर से बहुत कम खाना खाता है।

बुलिमिया में बच्चा ज्यादा खाना खाने के बाद उल्टी कर देता है या भोजन को शरीर से बाहर निकालने की कोशिश करता है।

जबकि बिंज ईटिंग में बच्चा अचानक बहुत अधिक खाना खाने लगता है और बाद में पछतावा महसूस करता है।

इन सभी स्थितियों का बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

यदि बच्चे लंबे समय तक पर्याप्त भोजन नहीं लेते हैं, तो इससे उनके शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते।

इसका असर उनके विकास, ऊर्जा स्तर और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में ईटिंग डिसऑर्डर के कुछ सामान्य संकेत भी दिखाई देते हैं।

जैसे कि बच्चे का वजन उम्र के हिसाब से ठीक तरह से न बढ़ना।

कुछ खास प्रकार के भोजन से अचानक बचने लगना।

खाने के समय चिंता या घबराहट महसूस करना।

खाने के बाद बार-बार उल्टी या बाथरूम जाना।

बहुत ज्यादा व्यायाम करना या वजन को लेकर अत्यधिक चिंतित रहना।

कुछ बच्चों में यह समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि वे धीरे-धीरे सामाजिक गतिविधियों से भी दूर होने लगते हैं।

वे स्कूल में ध्यान नहीं लगा पाते और दोस्तों के साथ समय बिताने से भी बचते हैं।

कई मामलों में बच्चे उदास, चिड़चिड़े या तनावग्रस्त भी दिखाई देने लगते हैं।

अगर समय रहते इस समस्या को पहचाना न जाए तो यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकती है।

ईटिंग डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों में कमजोरी, चक्कर आना, दिल की धड़कन अनियमित होना और शरीर का अत्यधिक कमजोर हो जाना जैसे लक्षण भी देखे जा सकते हैं।

इसलिए माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार और खान-पान की आदतों पर ध्यान देना चाहिए।

यदि बच्चा लगातार खाने से बच रहा है या उसका वजन तेजी से कम हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर पहचान और सही इलाज से ईटिंग डिसऑर्डर को नियंत्रित किया जा सकता है।

इस समस्या के इलाज के लिए आमतौर पर फैमिली-बेस्ड ट्रीटमेंट (FBT) का उपयोग किया जाता है।

इस उपचार में परिवार के सदस्य बच्चे की खान-पान की आदतों को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसके अलावा कुछ मामलों में कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) भी प्रभावी साबित होती है।

इस थेरेपी के माध्यम से बच्चे की सोच और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश की जाती है।

डॉक्टर बच्चों के लिए संतुलित आहार योजना भी तैयार करते हैं ताकि उन्हें पर्याप्त पोषण मिल सके।

कई बार डॉक्टर नियमित जांच और निगरानी के जरिए भी बच्चे की स्थिति पर नजर रखते हैं।

माता-पिता की भूमिका इस समस्या के समाधान में बेहद महत्वपूर्ण होती है।

बच्चों को खाने के लिए डांटना या दबाव डालना अक्सर समस्या को और बढ़ा सकता है।

इसके बजाय बच्चों के साथ सकारात्मक बातचीत करना और उन्हें भावनात्मक समर्थन देना ज्यादा जरूरी होता है।

बच्चों को यह समझाना चाहिए कि स्वस्थ शरीर के लिए संतुलित भोजन कितना जरूरी है।

सोशल मीडिया और बाहरी दबाव से बच्चों को बचाने के लिए भी माता-पिता को सतर्क रहना चाहिए।

बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाना और उनके शरीर को लेकर सकारात्मक सोच विकसित करना भी जरूरी है।

स्कूलों और समाज में भी इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

जब बच्चों और अभिभावकों को ईटिंग डिसऑर्डर के बारे में सही जानकारी होगी, तब ही इस समस्या को समय रहते रोका जा सकेगा।

आज के दौर में बच्चों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए अगर बच्चा खाने से लगातार बच रहा है या उसके व्यवहार में बदलाव दिखाई दे रहा है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।

समय पर पहचान, सही इलाज और परिवार के सहयोग से बच्चे पूरी तरह स्वस्थ जीवन की ओर लौट सकते हैं।

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